आकाश और सृष्टि को दार्जिलिंग आए दो दिन हो गए थे ।
आज वे एक पहाड़ी पर घूमने गए । बहुत हसीन मौसम था ।
सृष्टि में अब पहले से सुधार था । अब वह आकाश से बातें करने लगी थी । उसके होठों पर फीकी सी मुस्कान भी आ जाती थी । सृष्टि आकाश के करीब आई और उसे देखते हुए कहा -

सृष्टि :  आकाश, तुम्हें पता है मेरे एक भाई भी था । हिमांशु भैया से एक साल बड़ा । पांच साल पहले उसकी मौत भी एक रोड एक्सीडेंट में हो गई थी । मां इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर पाई और एक साल में ही वह भी हमें छोड़ कर चली गई । पापा, भैया और मां की मौत से टूट गए थे । पर मेरी खातिर उन्होंने बहुत हिम्मत रखी और मुझे किसी बात की कमी महसूस नहीं होने दी ।

आकाश ने सृष्टि को बाहों में भर लिया ।

आकाश :  सब भूल जाओ, सृष्टि । मैं तुम्हारे साथ हूं ।

तभी पीछे से बहुत से लोगों के आने की आवाज आई ।  यश ने जोर से चिल्ला कर कहा ।

यश :  इंस्पेक्टर साहब, मेरी भतीजी को इस दरिंदे से 
बचाईए। यह सृष्टि को मारना चाहता है ।

आकाश और सृष्टि ने हैरत से सब को देखा । जिनमें इंस्पेक्टर के साथ दो पुलिस वाले साथ ही हिमांशु और यश थे । जो कि आकाश को खा जाने वाली नजरों से देख रहे थे।

यश :  पकड़ लीजिए इसे इंस्पेक्टर साहब, यह सृष्टि को मारना चाहता था और मुझे लगता है भाई साहब के एक्सीडेंट होने में भी इसी का हाथ है ।

सृष्टि कभी अपने चाचा को देखती तो कभी आकाश को। वह कुछ समझ नहीं पा रही थी ।

सृष्टि :  यह क्या कह रहे हो चाचा जी, आकाश ऐसा नहीं कर सकता ।

यश :  सृष्टि, कल शाम मैं भाई साहब के कमरे में गया था । वहां भाई साहब की डायरी पढ़ी जिसमें लिखा था कि उन्हें लगता है आकाश उनके पार्टनर संजय राय का बेटा है । 
भाई साहब ने धोखा देकर उनकी जायदाद हड़प ली थी और अब आकाश उनसे बदला लेने आया है । उन्होंने जब पहली बार आकाश को देखा, तभी उन्हें संजय राय की याद आई । आकाश की शक्ल अपने पिता से काफी मिलती है और जिस दिन भाई साहब का एक्सीडेंट हुआ, उस दिन वे आकाश के पास ही गए थे । और जब मैं तुम्हारी शादी के बात भाई साहब से करने गया था, तब भी वे यही कह रहे थे कि वे आकाश के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानना चाहते हैं । इसीलिए उन्होंने जासूस लगाए थे । पर आकाश हमेशा से ही अच्छा बनने का नाटक कर रहा था । इसीलिए जासूसों के सामने भी उसने अच्छे रहने का ही अभिनय किया । शायद यह जानता था कि भाई साहब उस की जासूसी करवा रहे हैं ।

सृष्टि फटी आंखों से आकाश को देखने लगी, पर आकाश ने सृष्टि को नहीं देखा और उसने बताना शुरू किया ।

आकाश :  मेरे पिता संजय राय और हर्षवर्धन बिजनेस में पार्टनर थे । हर्षवर्धन ने मेरे पापा से धोखा किया और उन्हें जेल भिजवा दिया । सारा बिजनेस खुद के नाम पर कर 
लिया । मेरी मां इस गम में पागल हो गई और कुछ समय बाद उनकी मौत हो गई । मैं अनाथ आश्रम में रहा । जब मैं अठारह साल का हुआ तो अनाथ आश्रम वालों ने कहा, अब तुम यहां नहीं रह सकते बाहर जाओ खुद कमाओ खाओ । उन्होंने मुझे मेरा पुराना रखा हुआ सामान दिया,  जिसमें एक पत्र था । जो मेरे पिता ने मेरे नाम लिखा था । उसमें लिखा था बेटा, जब तक यह पत्र तुम्हे मिलेगा तुम बड़े हो चुके होंगे । मैं तब तक शायद जीवित ना रहूं । मैं तुम्हें यह बताना चाहता हूं कि दिल्ली में हर्षवर्धन मौर्य ने मुझ पर धोखाधड़ी का झूठा इल्जाम लगाकर मुझे जेल भिजवा दिया । मैं इस झूठे कलंक के साथ शायद जी ना पाऊं । मैं यह नहीं चाहता कि तुम बदला लेने के लिए गुनाह करो और जेल जाओ । मैं चाहता हूं कि तुम ऐसी तरकीब निकालो कि तुम्हारी जायदाद तुम्हें मिल जाए और हर्षवर्धन को दुख पहुंचे, वह पश्चाताप करें ।

आकाश की बातें सब ध्यान से सुन रहे थे । सृष्टि का रोना अब बंद हो गया था । आकाश ने आगे कहा ।

आकाश :  अनाथ आश्रम से निकलकर मैंने अपना काम शुरू किया । जिसमें आश्रम वालों ने मदद की और मुझे कर्ज भी दिया । मैं हर्षवर्धन को ढूंढते हुए दिल्ली आया । जब मैंने सृष्टि को देखा तो मुझे एक विचार आया कि मैं उसी से शादी करके जायदाद हासिल कर सकता हूं, पर मैं हर्षवर्धन को दुख भी देना चाहता था । इसलिए जब मौका मिलता,  मैं सृष्टि पर हल्का हमला करता जिससे हर्षवर्धन हमेशा सृष्टि के लिए परेशान रहे, सृष्टि के लिए डरता रहे । मैंने कभी सृष्टि को जान से मारने की कोशिश नहीं की । उसके खाने में बहुत हल्का जहर मिलाया । स्विमिंग पूल में सांप छोड़ा, जो जहरीला नहीं था । शिमला में पहाड़ी पर से पत्थर भी मैंने ही लुढ़काया था,जिससे सृष्टि डर गई थी । पर सृष्टि का साथ मिलने के बाद मैं सचमुच उससे प्यार करने लगा । 
उस रात हर्षवर्धन मेरे पास आया था । और यह जानकर कि मैं संजय राय का ही बेटा हूं, वह बहुत घबरा गया । मैंने कहा, कि मैं उनको कोई चोट पहुंचाने नहीं आया हूं और ना ही सृष्टि को उनके किए धोखे के बारे में कभी बताऊंगा । मेरे पापा बस यही चाहते थे कि मेरी जायदाद मुझे मिल जाए । मैं कोई गुनाह ना करूं, पता नहीं मेरी बात उन्हें कितनी सच लगी, मैं नहीं जानता । वे यहां से चुपचाप चले गए । रास्ते में उनका एक्सीडेंट हुआ, लेकिन एक्सीडेंट में मेरा कोई हाथ नहीं है ।

फिर आकाश ने सृष्टि को देखा और उसके पास जाकर भरे गले से बोला 
सृष्टि, मैं सच कह रहा हूं । मैंने तुम्हारे पापा को नहीं मारा, और ना ही कभी तुम्हें मारना चाहा । मैं हमेशा अनाथ आश्रम में रहा हूं । मैं तो एक परिवार चाहता था, जो मुझे प्यार करें और जिसे मैं प्यार करूं ।

सृष्टि अब संभल चुकी थी । वह जान गई थी कि उसके पापा के धोखे ने आकाश का बचपन, उसके पिता, माता, जायदाद, सब छीन लिए थे । उसने आकाश को प्यार से देखा  ।

सृष्टि : नहीं आकाश, मैं अपने पिता के गुनाह की भागीदार नहीं बनूंगी, बल्कि उनके गुनाह का पश्चाताप मैं करूंगी । जो तुम्हारा है, वह सब तुम्हें मिलेगा और मैं भी हमेशा तुम्हारी रहूंगी ।

यश और हिमांशु घर लौट आए । हिमांशु ने अपने पापा से कहा ।

हिमांशु :  पापा, क्या आपको यह सारी बातें पहले पता नहीं थी कि ताऊ जी ने धोखा किया है ।

यश :  नहीं, मुझे कुछ नहीं पता । मैं बाहर पढ़ता था । पिता के देहांत के बाद भाई साहब ने ही मुझे पढ़ाया लिखाया और काबिल बनाया । इसीलिए मैं उनकी इतनी इज्जत करता था, और तुम्हें भी कहता था ।

हिमांशु :  पापा, आप ने देख लिया ना, किसी को धोखा देना कितना बड़ा गुनाह है । मैंने भी मीना को धोखा दिया । वादा करके उससे शादी नहीं की, आप के कारण । इसी गम को भुलाने के लिए मैं रात दिन पीता हूं ।

यश :  हां बेटा, तुम ठीक कहते हो । मुझे माफ कर दो, बेटा । जाओ मीना से किया अपना वादा, पूरा करो ।

आज सृष्टि और आकाश की मिलन की रात थी । अब सृष्टि उदास नहीं थी । वह दुल्हन के लिबास में बहुत सुंदर लग रही थी । सृष्टि आकाश के पास आई । आकाश किसी सोच में डूबा हुआ था ।

सृष्टि :  क्या हुआ ? आकाश, क्या सोच रहे हो ?

आकाश :  सृष्टि, बाकी सभी हमले तो मैंने किए थे तुम पर, लेकिन तुम्हारी गाड़ी के ब्रेक फेल किसने किए ............?

                                                      समाप्त




नमस्कार,

सभी पाठकों का बहुत शुक्रिया । जिन्होंने इस सफर में मेरा साथ देकर मेरा मनोबल बढ़ाया ।




                            धनु दयाल