जैसे ही प्राण निकले जीवन लाल के वह अपने शरीर से अलग हुआ। वह देखता है कि मेरे जैसे ही व्यक्ति नीचे पड़ा है। कुछ देर उसे छूने का प्रयास करता है , लेकिन य़े क्या मैं उसे छू क्यों नहीं पा रहा... कुछ घंटों के बाद घर वाले जीवन लाल के चारों ओर बैठकर विलाप कर रहे होते हैं। जीवनलाल समझ जाता है कि मैं अब मर चुका हूं । ना कोई मुझे देख सकेगा ना ही कोई मुझे सुन सकेगा।
वह अपनी वेदना कर - दुखित होता है , मैंने जीवन भर हर कार्य बड़ी मेहनत परिश्रम करके परोपकार किया हां ...थोड़ा बहुत लालच भी किया । जिससे कुछ दौलत भी कमाई थी । यह सब सौच ही रहा था कि मोहल्ले की भीड़ इकट्ठा होने लगी । रिश्तेदारों को बुलाया, कोई आया कोई रह गया , दोस्त मित्र अपने पराए ,जिनको लगा वे ही आए । मोहल्ले की स्त्रियां मेरी पत्नी को समझा रही थी । बच्चे चीख-पुकार कर रहे थे , मैं भी कितना पागल हर कार्य में लगा ही रहता था ।कभी बच्चों के भविष्य उनके शौक को पूरा करने में कभी जमीनी विवाद के लेन-देन में हमेशा चिंता कर कर... सूख कर आधा हो गया था ।
अब यह दौलत आई भी तो मेरे किस काम की ।
"जब कोई व्यक्ति किसी समस्या या उसी में डूबा रहे उसका मन भी ना लगे तो इस समस्या को चिंता कहते हैं " मेरा छोटा भाई एक अकेले कमरे में अकेला दीवार के सहारे बैठ कर रोए जा रहा था । उसे कुछ नहीं सूझ रहा था , तीन-चार घंटे बाद कुछ बुजुर्ग कहने लगे बेटा जो होना था सो हो गया अब चाहे कितना भी रो लो करूण विलाप करो वह वापस तो नहीं आएगा । देखो जीवन लाल ने हमारे मोहल्ले में अमिट छाप बनाई उसकी व्यवहारिकता लेनदेन सब कुछ अति सराहनीय है । पर मरे हुये को कौन लाए ?
जल्दी करो अंतिम संस्कार की तैयारी कुछ ही घंटे बचे हैं रात होने में ... ?
में बस खाली देख सकता था ,और उसके सिवा मेरे पास कोई विकल्प नहीं था । कुछ घंटे बाद अंतिम संस्कार का सारा सामान लाया गया , मेरे अंतिम संस्कार की सारी रश्मे हान्डी , कफन , फूल , मखाने आदि । एकत्रित करके अर्थी को दुलहन सा सजाकर ले जाया गया । सभी जाते जाते कह रहे थे । राम नाम सत्य है ,राम नाम सत्य है । फिर क्या श्मशान में अंतिम क्रिया कर आग लगाई और फिर मेरे देखते ही सारी देह जल गई । मैं भटक रहा था कभी यहां कभी वहां ना कोई अभी तक यमराज जी आए ना कोई अन्य बस कभी अपने घर का करूण दृश्य देखता तो कभी अपने विरोधियों के अंदर छुपी मुस्कुराहटें ..!
चिंता हर किसी को होती है, कुछ समझदार लोग इसका मनन नहीं करते वे अपने विवेक से चिंता का समाधान करके खुश रहते हैं । तो कुछ अशिक्षित चिंता कोई ही बहुत बड़ी समस्या मानकर उसी में डूबे रहते हैं। गरीबों की आर्थिक स्थिति अधिकतर खानपान व चिंता में ही आधा जीवन गुजर जाता है । कोई अनजान जो चिंता की गहराई में इस कदर खोए की उसकी थाह तक जाते गए या कोई सार्थक प्रयत्न करके चिंता से उभर गए। चिंता मेरी हो या तेरी चिंता तो चिंता है । अरे उसका समाधान और वक्त के साथ हमेशा सार्थक प्रयास करो । जिससे चिंता का सर्वनाश हो जाए । बचपन में हर व्यक्ति बेफिक्र रहता है ।
ना खाने कमाने की चिंता ना परवरिश कैसा होगा उसकी चिंता अधिक चिंता व्यक्तियों के जीवन में उस "कोमा में गए व्यक्ति जैसी होती है"" जिस प्रकार ना तो जिंदा होता है ना मरा "कोमा में व्यक्ति को कोई होश नहीं रहता मौत का कोई , वह तो खाली बेहोश रहता है कब ठीक हो जाएगा ! सटीक पता नहीं होता ! मौत का कोई समय नहीं होता ! मैं अंतरमन कुछ अपने आप से बात करते कर उस श्मशान में पहुंचा। जहां मुझे जलाया गया था , मेरी तरह वहां भी उसके परिवार मित्रगण रिश्तेदार सभी रोए जा रहे थे ! जब मरना है एक दिन तो रोना क्या पीछे से अचानक एक स्वर सुनाई दिया । मैंने पीछे देखा तो , मैंने पीछे देखा तो वही व्यक्ति था जो कि इस वक्त श्मशान में जल रहा था...
.. उसने मुझसे कहा देख हमारे जैसे लाखों अरबों मनुष्य मर कर यूं भटक रहे हैं । किसी का प्रायश्चित होता है और किसी का नहीं । जीते जी अगर मनुष्य सब जानकर अनजान बना रहे , तो वह मर कर क्या कर सकता है । अरे जीवन ही मृत्यु का सच्चा मित्र व प्रति उत्तर है । जो करना है अपने जीते जी विवेक द्वारा कर । जो किया सो किया , जो नहीं कर पाए तो नहीं कर पाए , समय दोस्त सबको मिला है । मुझे भी और तुझे भी देख लिया । मित्र मेरे जैसे जीवनलाल मित्र तुमने सही कहा वे दोनों आपस में वार्तालाप कर रहे थे । अचानक उन्हें अपने जैसे और मरे हुए व्यक्ति मिलते गए । और सबसे एक दूसरे को हाल-चाल अपना -अपना कह सुनाया ! किसी ने कहा कि मेरी एक्सीडेंट में मौत हुई थी ! तो किसी ने कहा मैंने आग लगा दी! अमुक ने कहा मुझे फांसी पर चढ़ा दिया गया , किसी ने कहा मैं पानी में कूदकर मरा ,
ना किसी को स्वर्ग मिला ना किसी को अब तक नर्क ..सभी अदृश्य आत्माएं भूमि पर मेरे जैसी भटक रही थी । फिर भी मेरा मन सब कुछ जानकर अनजान बन रहा था । घर का मोह अभी तक मेरे दिलो-दिमाग से नहीं निकला मैं अकेला ही फिर अंतर्मन से बातें करते-करते अपने घर पहुंचा । वहां बीवी को घर वाले मना - मना कर हार गए बीबी खाना -पीना कुछ नहीं खा रही ... और बच्चे सब वेसे उदास मन से बैठे थे ! ऐसा चार-पांच दिन तक चला ? में लाख यत्न कर रहा था , अपने मां-बाप को घर वालो से कुछ कह सकूं । लेकिन खुद जब जीते जी नहीं समझा तो उन्हे क्या समझाता ! में अपने -अपने विचारों का विरोधाभास मुझे मरकर भी मारता जा रहा था !
मेरी वेदना को वही समझ सकता है जिसने सच जाना ! मनुष्य की जिंदगी कमाने खाने अपनी आवश्यकताओं को पूरा करते करते आधी गुजर रही है । और गुजरेगी में फिर वापस उसी श्मशान में रात को पहुंचा . फिर मुझे मरे हुए व्यक्ति साथी मिले उन्हीं के संग में मैंने कई रातें वही गुजार दी ! कुछ दिनों के बाद एक मरे हुए बुजुर्ग ने कहा जब तक मनुष्य को हर वस्तु रिश्ते संबंध से पूरा मुंह नहीं छूटता उसे मुक्ति कभी नहीं मिलती ! मैं मर कर भी आज कई हजारों सालों से इसी भूमि पर भटक - भटक कर जी रहा हूं अनेकों इतिहास अनेकों परिणाम देख चुका हूं ।
फिर मेरे अंतर्मन ने मुझे आवाज दी चिंता का समाधान होता है मनुष्य चाहे तो जीते जी उसकी चिंता का सर्वनाश हो जाएगा तभी व्यक्ति सुखी जीवन अपने कर्तव्य के प्रति अग्रसर होगा वरना चिंता और चिता कहते सुनते हजारों वर्ष हो जाएंगे कुछ नहीं होगा ! चिंता और चिता में एक मात्र बिंदु का फर्क होता है उसी प्रकार मृत्यु और जीवन में समय ही एकमात्र बिंदु है,,,,, जिससे कई मनुष्य जीवनलाल ..जैसा बन जाता है , या फिर मर कर ही समझ आता है ।
अतः मनुष्य अपनी चिंता को चिता तक ले जाए । ना कि वह स्वयं जल जाए !
कहानी समाप्त
"लक्ष्मीनारायण ठाकुर "
देवरी जिला सागर मध्य प्रदेश

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