कल तक था गुरूर
वह काया
पंचतत्वों में हो विलीन
काली रेत बन गयी
काया का स्वामी
चला गया दूर
देखता भी नहीं
काया मिट गयी काली रेत में
जिस पर था गुरूर
वह काया मिट गयी
काली रेत में
धनी था या था निर्धन
कमजोर या शक्ति का धाम
सवर्ण या दलित
अंतर तो नहीं कुछ
काली रेत में
रचनाकार : दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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