तुम्हारी चाह ने मुझे,क्या से क्या  बना डाला"
मुझे तेरी ,मुरादो ने टूटता तारा बना डाला!

तेरे सपने जो हो पूरे,दुआ दिल से यही निकले,
तेरी उस अर्श की चाहत ने,मुझे फर्श दे डाला!

कई नग्मे यहाँ  बिखरे,कई फनकार भी आये,
तेरे आने से महफिल से,कई गजले गवाँ डाला!

मुंतजिर हूँ ,मगर अब नही ,इंतजार है तेरा,
तेरी इक नज्म की खातिर ,खुद को भूला डाला!

न अब फरियाद मिलने की,न कोशिश है ,पाने की,
तेरी इक याद ने ,रात का काफीर बना डाला!

चलो छोडो ये आँधी है,ज्जबाती मुहब्बत की,
वहाँ बेगुनाह तुम भी थे,यहाँ गुनाहगार कर डाला!
       रीमा महेन्द्र ठाकुर (लेखिका)
  रानापुर -झाबुआ -मध्यप्रदेश -भारत