ऐसा लगता है ,थम सी गई जिन्दगी.
कब .कैसे कुछ भी तो पता नही!
घुटन है,कही अटकना है ,साॅसो का,
अंतहीन चल रही है ,अभी तक थमी नही!
गुजरते लम्हे,छायाचित्रो से,सपने पलको मे,
छुपे है,जो ढूढँते है हम, अगाज वो नहीं!
कई बार सोचते है,आसमानो को नाप ले"
पर पत्थर इतने मिले,अब हौसला नही!
टकराते है,हमसे,हमारे ही सवाल'
बेबुनिया जिन्दगी का क्या अंत ही नही!
हँसते है हम आज भी,पर आँखो मे है नमी,
बतालाये ,तुम्है कैसे ,अब कमी नही,!
कितने है ख्वाहिश,तेरे साथ जीये हम,
ऐ जिन्दगी ,ऐ जिन्दगी,तू मिली हमे नही!
रीमा महेन्द्र ठाकुर(लेखिका)
रानापुर -झाबुआ -मथ्यप्रदेश -भारत

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