देवराज इंद्र का दरबार सजा था,अप्सराएं नृत्य कर रही थी,गंधर्व गण गायन और वादन में व्यस्त थे।
देवराज मुदित मुद्रा में नृत्य का आनन्द उठा रहे थे।
उर्वशी,रम्भा ,सब अपने नृत्य ने डूबी थी ,लेकिन आज नयनतारा का मन नृत्य में नहीं लग रहा था,वह देवराज इंद्र की सुंदरता पर रीझी हुई थी,बार बार नज़रे चुरा उन्हें निहार रही थी।
अचानक देवराज की नज़रे उसकी ओर गई ,और उसकी आंखो ने जैसे उसके मन की बात जान ली थी,एक इशारा आंखों की तरफ से हुआ।
देवराज इंद्र पल भर समझ ना पाए,पर अगले ही क्षण उन्होंने नयनतारा के मन की बात समझ ली।
नृत्य खत्म हुआ।देवराज नयनतारा के पास आए,प्रणय निवेदन था नयनतारा की ओर से।
फिर तो नयनतारा इंद्र की प्रेयसी बन गई।
एक बार ऋषि वज्रा कठोर। तप कर रहे थे,इंद्र का भीरू स्वभाव जो अपने इंद्रासन के खोने के डर से आशंकित रहता है।फिर एक बार परेशान हुए इंद्र ,उन्हें नयनतारा की आंखों के जादू का भलीभांति अहसास था ,उन्होंने नयनतारा को ऋषि वज्रा की तपस्या भंग करने को भेजा।
नयनतारा ऋषि के तप को अपने लुभावने यौवन,मादकता से तोड़ने की कोशिश करनी शुरू की।
अंत में ऋषि की तपस्या टूटी ,क्रोधित ऋषि वज्रा ने उसे राक्षसी होने का शाप दिया।
नयनतारा के बार बार माफी मांगने पर उन्होंने कहा तुम्हारा उद्धार अब प्रभु अपने अवतार में करेंगे.....
तुम प्रभु के अवतार में उनकी मदद करोगी।
नयनतारा 🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌚👹👹
भाई तुमने मुझे विधवा बना डाला,अब मैं कैसे अपना शेष जीवन बिताऊंगी - सूर्पनखा ने अपने भाई रावण से कहा।उसका सुहाग उजड़ चुका था , आंखों से अश्रुधारा निरंतर उसके अंगवस्त्रों को भिगो रही थी।
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रावण जीत की खुशी में मदहोश था,नृत्य चल रहा था,मदिरा का पान करते सभी राक्षस अत्यधिक प्रसन्न थे।🎉🎉💃👯
कोई भी सूर्पनखा की बात नहीं सुन रहा था।
सूर्पनखा रुदन करती, अपने कमरे में चली गई ,अगले दिन राजदरबार में क्रोधित हो पहुंची,उसने अपने भाई हे भ्राता तुमने मेरे पति विद्युत जिह्वा मार कर मुझे वैधव्य पुरस्कार में दे दिया।
रावण को कोई ग्लानि नहीं थी,उसने बेशर्मी से जवाब दिया अरे बहना ",संग्राम हुआ, विद्युतजिह्वा मेरे सामने लड़ने आया तो, मैं क्या करता??" जोर से अट्टहास करने लगा रावण।
कालकेय जाति के राक्षस पाताल में निवास करते थे,विद्युतजिह्वा राजा का सेनापति था।त्रिलोक विजय के क्रम में रावण ने पाताल विजय किया अपने बहनोई को यमपुरी पहुंचा कर।
तू बिल्कुल चिंता ना कर,_ तुझे भोग विलास की कोई कमी ना होगी,14,000 राक्षसों और भाई खर दूषण संग तू जना स्थान में निवास कर।
पति की मृत्यु के बाद सूर्पनखा बिल्कुल अकेली हो गई थी,उसने मन ही मन रावण को शाप दिया ,की मैं तुम्हारी मृत्यु का कारण बनूंगी।
और उसके बाद ,उसने दंडकारण्य में आतंक मचा दिया।
राम ,लक्ष्मण और सीता के वन आने पर प्रणय प्रस्ताव ,अस्वीकार होने के बाद वो हिंसक हो,सीता पर हमला करती है।जिसमे परिणामस्वरूप उसके नाक और कान लक्ष्मण के हाथों काट दिए जाते हैं।
और फिर रावण द्वारा सीता का हरण ,और फिर राम द्वारा, राम रावण युद्ध संपादित होता है।
और इन सबका परिणाम रावण के वध से पूर्ण होता है।
और इस तरह सूर्पनखा का शाप फलित होता है।
रावण वध के बाद सूर्पनखा ,तपस्या में लीन हो जाती है।
लेकिन राक्षस योनि से मुक्ति उसे द्वापर युग में भगवान कृष्ण ने उसके कुब्जा रूप से उद्धार कर दिया,और अपनी पत्नी के रूप में स्थान दिया।
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