(अस्वीकरण)
(इस कहानी के सभी पात्र और उनके नाम और घटनाएं काल्पनिक हैं और इसका किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति या घटना से कोई भी संबंध नहीं हैं। यह कहानी किसी भी व्यक्ति के निजी जिन्दगी से प्रेरित नहीं है। यह पूरी तरह से एक कल्पनात्मक रचना है। यदि किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से समानता पाई जाती है तो ये मात्र एक संयोग होगा।)

स्वरचित कहानी लेखन का यह मेरा प्रथम प्रयास है,आप सभी पाठकों से निवेदन है कि उचित समीक्षा करें , बेबाक़ लिखें ताकि मुझे सीखने का उचित अवसर मिल सके
                           (भूपेन्द्र सिंह चौहान)



मिस रागिनी.....रागिनी...तोमर !

मंच से दो बार रागिनी का नाम पुकारा गया,

बेस्ट  अवार्ड  के  लिए  अपना  नाम  सुनकर, 

रागिनी को अपने कानों पर यकीन नहीं हो रहा था | 

तालियों की गड़गड़ाहट, रागिनी के दिल की धड़कनों 

को और तेज़ बढ़ा रही थीं,उसे  लग रहा था मानो, वह 

  कोई सपना देख रही हो, सपना ? हां, वह  सपना !

हर उस इंसान के लिए, एक सपना ही तो रह जाता है,  

जिसने कभी,अपने जीवन  में आने  वाली    
     नित दिन,हर पल नया बदलाव लाने वाली        

चुनौतियों का सामना करने की हिम्मत ही न की हो,  
 कुछ   नया  कर  दिखाने की चाहत ही न  की  हो, 

उसके लिए वह  सपना, एक  सपना ही रह  जाता है जीवन में कभी हक़ीक़त में तब्दील नहीं  हो  पाता है

उन परिस्थितियों में, रागिनी जैसी औलाद के लिए, 

उसका कुछ बनने का जज़्बा, कुछ अलग कर दिखाने 

का  जुनून, किसी  ख़्वाब  देखने  से  कम  न  था,       

जब बचपन में उसके सर से 

अपने मां बाप का साया उठ जाता है | 


रागिनी के पालन पोषण की ज़िम्मेदारी अपने कन्धों 

पर आते देख उसके सगे_संबंधियों की पेशानियों पर बल पड गए थे | 

भगवान का शुक्र मानो या रागिनी की क़िस्मत !   

उसके दादा दादी, मरने से पहले, पुश्तैनी जायदाद 

अपनी इकलौती नातिन रागिनी के नाम कर गए थे । 

सो जग हँसाई का डर हो या अन्य लालच, 

उसके मामा मामी ने पाला पोसा, 

वरना फ़ाकाकशी की नौबत आन पड़ी थी बेचारी पर

   सड़कों पर ही काटने पड़ते बाकी के दिन।       

बचपन तो  बुरे दिनों की भेंट चढ़ ही गया था,

कहते हैं जिन घरों में हालात ठीक न हों उन घरों के 

बच्चे जल्द समझदार हो जाते हैं,

रागिनी उन जैसे 

बच्चों की सबसे बेहतरीन मिसाल थी।

एक सडक़ दुर्घटना में रागिनी ने
                  
अपने पिता को बचपन में खो दिया था |

पिता की दुनिया रुखसती के वक़्त रिश्तेदारों ने 
  
लोक  लिहाज़ से मदद जरूर कर दी थी |

परंतु उनके अहसानों तले उसकी मां भी, लंबी बीमारी 

के चलते दो वर्षों बाद भगवान को सदा प्यारी हो गयीं | 

मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा था,बेचारी नन्हीं जान पर ,

सिर्फ छह वर्ष की उम्र में ही, 
   
विपरीत हालातों ने उसका दुनियादारी से,

बेहतरीन तरीके से परिचय 

करवाना चालू कर दिया था,

और अब तलक जिंदगी एक शिक्षक की भाँति  

रोज एक नया पाठ पढ़ाये जा रही थी ।     

    रागिनी के मम्मी, पापा उसे प्यार से रानू बुलाते थे । 

अपने जीते जी, उन्होंने उसके लालन पालन में कोई 

कसर नहीं छोड़ी थी। अपनी हैसियत से बढ़कर

उन्होंने उसका दाखिला इंग्लिश मीडियम स्कूल में 

करवाया और उसकी बेहतरीन परवरिश की। 

रागिनी की मम्मी सरला अपने नाम के मुताबिक ही 

सरल स्वभाव वाली मृदुभाषी महिला थीं,

आत्मविश्वास तो मानों उनमें कूट~ कूट कर भरा था। 

भले ही पति की असामयिक मृत्यु ने उन्हें झखझोर 

कर रख दिया था, परंतु उन्होंनें अपने  जीते जी, 

कभी भी परिस्थितियों से हार नहीं मानी ।

वो न केवल  अबोध रागिनी को, जीवन की हर ऊँच 

नीच से अवगत करवाती रहीं। अपितु उसमें, जीवन में 

कुछ बनने का जुनून जगाकर, सकारात्मक ऊर्जा की 

लौ जलाकर, वह शून्य में विलीन हो गयीं। 

कहने को तो डॉक्टरों के हिसाब से उसे क्षय की 

बीमारी थी, दोनों  फेफड़े खराब हो चुके थे उसके, 

परंतु सड़क दुर्घटना में 

पति का  जल्द अलविदा होना....

फ़ेफ़डे ही क्या.... 

बेचारी का सब कुछ क्षीण क्षीण कर गया था 

तिस पर नन्हीं जान की चिंता !

मानो काल ने  उसे जीते जी लील लिया हो।

अपने माता पिता के सदा के बिछुड़ने के गमों

तथा उनकी दी हुई सीखों ने रागिनी के दिल को 

फौलाद जैसा मज़बूत बना दिया था।
  
रागिनी जीवन के हर मुकाम पर कठिनाईयों के सामने 

चट्टान की भांति अड़िग रही। संसाधनों का अभाव हो 

या अपमान के कड़वे विष का घूँट वह ऐसे पीती गयी 

मानो उसे किसी समुद्र मंथन में उसे कोई

अमृत मिलने वाला हो,

शायद उसे किसी अमृत मंथन की ही तलाश थी

और यह मंथन उसके अलावा कोई और कर भी नही 

सकता था । माँ बाप काल कवलित हो गए थे और 

अन्य में इच्छा शक्ति का अभाव था वह अपनी पढ़ाई 

पर सदा केंद्रित रहती थी । हालांकि उसके मामाजी    

एक नेक दिल इंसान थे पर दुनियादारी पर किसका 

वश चलता है, बेचारे पत्नी के ज़ुल्मों सितम से वह 

अनजान न थे, परन्तु उसकी ख़िलाफ़त का, उनमें 

बिल्कुल भी हौंसला न था, सो वह हमेशा चुप्पी धारण 

किये रहते पर उन्हें रागिनी की फ़िक्र हमेशा जरूर बनी 

रहती थी । आख़िरकार रागिनी ने अपने जीवन का 

ध्येय मानव सेवा बना लिया था, वह चाहती थी कि वो 

किसी ऊंचे पद पर आसीन होकर मानवमात्र की सेवा 

करे उन लोगों की भलाई के कार्य करे जिनके माँ बाप  

दुनिया से बिछुड़ गये हैं,भला इस दर्द को उससे बेहतर 

तरीके से और कौन जान सकता था। इसलिए वह उन 

दिनों सिविल सर्विसेज की तैयारी करने की सोच रही 

थी, उसने ठान लिया था वह एक दिन इस काबिल 

जरूर बनेगी मानव मात्र की सेवा कर सके,

अपने माँ  बाप  का  नाम खूब रोशन कर सके।

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रागिनी के जीवन में खुशनुमा,

                 बसंत का मौसम आ गया था । 

तीखे नैन नक्श वाली रागिनी के सांवले रंग के गालों 

पर  झूलते सुनहरे बाल, उसकी बेमिसाल खूबसूरती के 

उत्कृष्ट प्रमाण थे ,सिर्फ़ सूरत ही नहीं, सीरत से भी 

ऊपरवाले ने उसे बेहतरीन तरीके से नवाज़ा था। उसके 

जीवन में बसंत   के मौसम की आहट उसके पदचापों 

में स्पष्ट सुनाई  देने लगी थीं , उसके दिल की बगिया 

में, प्रेम की कोपलें फूटने को बेताब थीं , इन दिनों 

उसका दिल बेकरार रहने लगा था।

इन सब बेकरारियों  की वज़ह  का खूबसूरत नाम था 

रोहित.............…........... रोहित शर्मा, 


रोहित उसके बचपन का सहपाठी था।

लड़कियाँ..  उसपे इस क़दर फिदा थीं,कि शहद पर  

मधुमक्खियों की तरह उसके इर्दगिर्द मँडराती रहती थीं

और रोहित  ज़नाब को अपने ख़्वाबों की शहजादी के 

ख्यालों से फुरसत मिले तो बेचारियों को घास डाले, बेचारी लड़कियाँ.....

सचमुच , ख़्वाबों के राजकुमार सरीखे नैन नक्श थे 

रोहित के, उसके होंठों पे मुस्कान तो ऐसे चिपकी 

रहती मानो लबों ने मुस्कान से सात फेरे ले लिए हों, 

बहुत आकर्षक व्यक्तित्व का धनी था रोहित....

उसे इस प्रकार की लड़कियों में कतई दिलचस्पी नहीं 

थी , वह रागिनी को पसंद करता था,

दोनो ही हमउम्र थे और दोनों के सपने भी एक समान थे  ।

   वे सिविल सर्विसेज में सलेक्शन के लिये जी तोड़ मेहनत कर रहे थे।

रोहित : क्या रागिनी , तुम भी कमाल करती हो,

दो दिन हो गए हमको मिले हुए,

            एक तुम हो कि साहिबा को फिक्र ही     
       नहीं है कि एक फ़ोन ही कर लिया जाए

रागिनी: देखो रोहित तुम तो  जानते  ही हो , 

सिविल सर्विसेस की तैयारी कितनी टफ होती है और 

ऊपर से मामीजी का रवैया , फिर भी तुम सवाल पे 

सवाल किए जा रहे हो, मानो क्वेश्चन मशीन हो।

वैसे आज मैं फैसला ले चुकी हूँ! चूँकि हम प्यार के   

ख़िलाफ़ नही हैं, परंतु और लोगों की तरह, अपने 

करियर पर ध्यान देने की बजाय,झूठी ख़्वाबों की 

दुनिया के सपनों में खोने की मेरी आरज़ू कतई नहीं हैं, 

मैं तो  सिर्फ यह चाहती हूं,प्यार करने के लिए ,हमारे 

पास सारी उम्र पड़ी है इसलिए हम आज से एक छत 

के नीचे रहते हुए भी अपने सपनों की ख़ातिर अजनबी 

बनकर रहेंगे और यही दूरियाँ....... हमें अपने सपने के 

करीब लायेंगी और सलेक्शन के बाद हम शादी करके 

एक दूजे  के करीब भी एक दिन हो जायेंगे

फिलहाल हम दोनो को सिविल सर्विसेज की तैयारी पर 

भरपूर ध्यान देना चाहिए, यही हमारी इच्छा है और 

यही हैं हमारे सुनहरे.... सपने !

मन ही मन कुछ सोचते हुए रोहित ने हामी भरी और  

जज़्बाती  होकर बोला, रागिनी! सचमुच मुझे तुमसे  

बहुत प्यार है,तुम्हारे सपने मेरे सपने हैं, 

एक दिन सब सच होंगे,मैं हर परिस्थिति में तुम्हारे 

साथ हूँ ,तुम्हारे जीवन के हर सपनों को हकीकत में 

बदलने में तुम्हारा साथ दूँगा, रोहित की बात सुनकर 

रागिनी की आँखे डबडबा आयीं,उसे आज अपनी 

दोस्ती, अपने प्यार पर फख्र हो रहा था, उसे ऐसा 

दोस्त मिला है, जो जल्द ही उसके सपनों का सफर 

पूरा करने का साथी ही नही बनेगा बल्कि जीवन के 

सफर का साथी भी बनेगा ।

    फ़्लैश बैक ....समाप्त

सात वर्ष उपरांत.............

रजत ने उसके पल्लू को खींचकर पुकारा, मम्मा !

आपका नाम बोल रहे हैं, आपको मंच पर बुला रहे हैं, 

तो उसकी तन्द्रा टूटी, अनाथ बच्चों की सेवार्थ में ट्रस्टी 

के सम्मानार्थ अवॉर्ड समारोह में, 

कलेक्टर रागिनी तोमर का नाम मंच पर पुकारा जा 

रहा था, वह उन सात वर्षों की यादों के बवंडर में मानो कहीं गुम हो गयी हो गयी थी।

दो साल की बेटी नेहा की उंगलियों को पकड़े रोहित 

मुस्कुराते हुए बोला ...अब चलो भई , जाओ !

तुम्हारी मेहनत की तपिश में

तुम्हारे सपने सुनहरे हो गए हैं,

हकीकत में तब्दील हो गए हैं

मैं आपके बिना ये अवार्ड कैसे ले सकती हूँ आपको भी 

मेरे साथ चलना पड़ेगा....रागिनी ने मुस्कुराते हुए रोहित से कहा :

क्या ये सिर्फ मेरे  ही सपने थे, नहीं, हमारे सुनहरे सपने 

थे जो आपके कारण पूरे हुए हैं डिप्टी कलेक्टर साहिब 

आप न होते तो सचमुच मेरा सपना 

एक सपना ही रह जाता.....

इति