कभी किसी रोज जगे,
और बस चल दें,
हाथों में तेरा हाथ हो प्रियवर
और दोनों कहीं दूर चले...।
रास्तेभर हो फिर बातें हमारी
हौले से फिर जब तू हँस दे,
मुस्कुरा जाये सारा समाँ
लब जो तेरे कुछ कह दें,
हाथों में तेरा हाथ हो प्रियवर
और दोनों कहीं दूर चले...।
न परवाह अपनी,न महामारी की
स्वयं को अलग जहाँ से कर दें,
दुनिया जब मेरी तू ही है,
तो फिर और किसको जगह दें,
हाथों में तेरा हाथ हो प्रियवर
और दोनों कहीं दूर चले .....।
दो कप चाय और तुम हो,
जहाँ चाहे फिर जले,
कमी तुम्हारी न हो बस,
कमी फिर किसी भी की खले,
हाथों में तेरा हाथ हो प्रियवर
और दोनों कहीं दूर चले...।
हे ईश्वर,खत्म कर दिक्कत
ये मुसीबत भी अब टले,
बहुत हुआ ये दौर दर्द का,
बहुत हो लिये ये सिलसिले,
हाथों में तेरा हाथ हो प्रियवर
और दोनों कहीं दूर चले...।
स्वरचित व मौलिक✍
सुमित सिंह पवार "पवार"
उत्तर प्रदेश पुलिस
आगरा

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