यह कविता ओशो की पुस्तक से ली गई है जो मैं आपके साथ शेयर कर रही हूं क्योंकि यह मुझे बहुत ही पसंद है ।
इसमें ईश्वर कह रहे हैं -

सौ-सौ सांचे बना रहा तू,
किसी एक में मैं आ जाऊं ।

यह तो ज्यों त्रिकोण के मुख में,
वर्गाकार दंड को रखना ।
यह तो जैसे कनक कसौटी पर
हीरे का मोल परखना ।

यह तो कठिन असंभव-सा है,
जैसे गूंगे को पंचम स्वर ।
मानो, कोई चला मापने
वामन अपने पद से अंबर ।

तेरे ये सांचे सब सीमित,
मैं असीम किस भांति समाऊं ?