मजदूर दिवस पर विशेष
बिरजू काका आज फिर बाबू साहब की हवेली में कुछ रुपए लेकर आए थे।बाबू साहब गांव के सरकारी शिक्षक थे। गांव के रहवासियों की मदद करना, उन्हें सही रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करना , शिक्षा के प्रति गांव के लोगों की मानसिकता बदलना जैसे कई कार्य ,उनको गांव वालों के बीच विशेष स्थान दिला चुके थे!!
बिरजू काका को भी बाबू साहब ने ही समझाया था ---- "" देखो बिरजू काका तुम्हारा बेटा पढ़ने लिखने में बहुत होशियार है,इसलिए इसे अच्छे से पढ़ाओ आगे जाकर ये बहुत कुछ कर सकता है""!
बिरजू काका --""हां बाबू साहब मैं इसलिए ही रुपया जमा कर रहा हूं , कि बेटा शहर जा सके पढ़ने""!
बाबू साहब --""हां काका मुझे पता है तुम चिंता ना करो ,हम भी शहर में अच्छे कालेज में दाखिला लेने में मदद करेंगे""!
बिरजू काका और उसकी पत्नी जमीदार के खेतों में मजदूरी करते और एक एक रुपया जमा करते जाते।
आज बिरजू ने पूरे चार साल बाद बाबू साहब से पूछ लिया ---""बाबू साहब जरा हमारा खाता देख कर बता देते की कि हमारा कितना रुपया जमा हो गया है""!
बाबू साहब ने बिरजू काका का खाता इतमीनान से देखा और बताया --"" काका देखो तुम्हारा अभी तक पच्चीस हजार रुपया जमा हो चुका है,तुम्हारा बेटा अब शहर जा सकता है पढ़ने ""!
बिरजू काका --"बहुत मेहरबानी बाबू साहब आपने हमारा खाता बनाया नहीं तो हम मजदूर कहां इतना पैसा जमा कर पाते , अब आप ही इन पैसों से हमारे बेटे को शहर ले जाकर पढ़ाओ ""!
बाबू साहब --" काका मैं तुम्हारी मेहनत का एक एक पैसा ,तुम्हारे बेटे की अच्छी शिक्षा में ही लगाऊंगा ""!
बिरजू काका --"" बाबू साहब अब आप मेरा एक और अलग से खाता बना दो ,उसमें मैं कल से पैसे जमा करूंगा ""!
बाबू साहब --"क्यों काका अब एक और खाता अलग से क्यों बना रहे हो??
बिरजू काका -- ""बाबू साहब अब हमें और रुपया जमा करना है, तुम्हारी काकी का इलाज कराना है, कभी कभी वह भी दर्द से बहुत तड़पती है, डाक्टर साहब कह रहे थे,पथरी है, शहर ले जाकर आपरेशन कराना पड़ेगा, और सोच रहा हूं जब शहर जाऊंगा तो अपने भी घुटनों का इलाज करा लूंगा ""!!
बिरजू काका की बात सुनकर बाबू साहब अपनी गद्दी से उठ खड़े हुए और बिरजू काका से बोले --"" काका जब इतनी तकलीफ है तो पहले शहर जाकर इन पैसों से अपना और काकी का इलाज कराओ , बेटा बाद में पढ़ने शहर चला जाएगा ""!
बिरजू काका --” नहीं बाबू साहब , हमने रुपया इसलिए जमा किया है कि बेटा शहर जाकर पढ़े और कोई अच्छे काम धंधे में लग जाए, हमारी तरह उसे भी दूसरों की मजदूरी ना करना पड़े , हमारा जीवन तो कट गया , पर हम नहीं चाहते कि हमारा बेटा भी इस तरह का जीवन जिए, इसलिए हमने इतना रुपया पहले उसके लिए जमा कर दिया ""!!
बिरजू काका की बात सुनते ही बाबू साहब को अपने पिता की याद आ गई ,यही सोच कर पिताजी ने भी मुझे शहर भेजा था।आज उनकी मेहनत से ही मैं इतना पढ़ लिख गया और आज इसी गांव में सरकारी शिक्षक बन कर आया हूं ""!!
स्वरचित,
कीर्ति चौरसिया
जबलपुर (मध्य प्रदेश)

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