ईश्वर की प्रदत्त
ये प्रकृति की धरोहर,
पोषण करती ये सबका
लगती अति मनोहर !!
वरन होता जब प्रकृति का
बन जाती पर्यावरण ,
अपने अनमोल रत्नों से
सजा देती धरा और गगन !!
ये सरिता ,ये तट ,ये तरनी
झर झर बहते ये झरने ,
ये पर्वत ,ये शिखाएं
प्रेम से आंचल फैलाएं !!
ये पल्लव, और सुमन
लहलहाते ये वृक्ष ,
देते प्राण वायु सभी को
नहीं देखते जाति ,या वर्ण !!
खेल किया मानव ने खुद
समझ बैठा पूरा अधिकार,
दिखाया रूप प्रकृति ने अपना
स्वयं कर दिया प्रतिकार !!
उपनिषद्, वेद पुराण
देते हमको यही ज्ञान ,
तरुवर की छाया में तप करते
शिव कैलाश में धरते ध्यान !!
पर्यावरण का मान करो सदा
उचित, अनुचित का ध्यान कर,
कार्बन की काली छाया से
बचाओ ये गगन, ये धरा !!!
स्वरचित, मौलिक, सर्वाधिकार सुरक्षित
कीर्ति चौरसिया
जबलपुर ( मध्य प्रदेश)

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