लोगों के कहने से माँ "सीता" को दुख सहना पड़ा,
"राजमहल" का त्याग कर कुटिया में रहना पड़ा..।
पवित्र सीता पर लोगों ने "लांक्षन" लगा दिए,
श्री राम देखते रह गए कुछ "कह" नहीं पाए...।
राजा जनक रोते रहे देख बेटी का "भाग्य"
महलों की राजकुमारी का कैसा ये "दुर्भाग्य"...।
सीता जैसी नारी का इस में भी ना होता "सम्मान"
उस युग से इस युग तक लोगों का बस है यही काम।
लोगों की बातों पे ना जाएं बातें "दुख" दे जाएगी,
अब ना फटेगी ये धरती ना,
"सीता" उसमें समाएगी.......।
ऋचा कर्ण✍🏻✍🏻✍🏻

1 टिप्पणियाँ
बहन। क्या आप बहन श्वेता कर्ण की कोई रिश्तेदार हैं।