सत्या ,और पारितोष गंगा मैया को आज चुनरी चढ़ाने आए थे।कितने संघर्षों के बाद आज ये शुभ दिवस आया था।
तभी यादों का एक झोंका आया ,और उन्हें अतीत के उस कालचक्र में ले गया ,जो वे पीछे छोड़ आए थे।
अमीर घर का बेटा था पारितोष,जबकि सत्या गरीब मजदूर की बेटी, पिता बीमार रहते,मां का साया बचपन में ही उठ गया था..!
बनारस की तंग गलियों में उसका घर था । सत्या यहीं बनारस के घाटों पर गजरे और फूल बेचा करती थी। लोग फूल लेते और विश्वनाथ जी को चढ़ाते और कुछ जो अपनी महिला मित्रों और पत्नियों के साथ होते वो सुंदर गजरे ले जाते।ऐसे ही एक दिन मुलाकात हुई थी ,इन्हीं घाटों पर सत्या की पारितोष से।
वह अपनी प्रेयसी अनन्या के साथ उससे गजरे लेने आया था। छुट्टे पैसे नहीं होने की वजह से उसने सौ रूपए के नोट सत्या को दिए, सत्या के पास भी छुट्टे पैसे नहीं थे,तो उसने उसे रख लेने को कहा।
आज चार साल बाद पारितोष उसे अकेला घाट पर दिखा। फटे पुराने कपड़े पहने,लोग उसे भिखारी समझ कुछ पैसे फेंक रहे थे,वह उसके सामने से गुजरा,एक पल के लिए सत्या की आंखे खुली की खुली रह गईं,वो सजीला नौजवान , चौड़ा माथा ,भीनी भीनी परफ्यूम की खुशबू जो उसने चार साल पहले लगाई थी ,आज भी सत्या की नथुनों में बसी थी।वह दौड़ी दौड़ी परितोष के पास गई।
"" क्या हुआ साहब ?" आप इस हाल में कैसे?
पारितोष ने उसे घूर कर देखा ,जैसे पूछ रहा हो,की कौन हो तुम ,क्यों मेरी ख़बर ले रही हो ?
सत्या ने उसका हाथ पकड़ा और अपने घर ले आइए !
घर पहुंच कर उसने पारितोष के हाथ ,पैर धुलवाए। पिता से बताया कि वही बाबू जी है जो सौ का नोट देकर चले गए थे।आज इस हालत में हैं।पिता ने कोई आपत्ति नहीं की !
उसने पहनने के लिए पिता के साफ कपड़े दिए।
और खाने के इंतजाम में जुट गई। गर्मागर्म खाना पारितोष ने आज कई महीनों बाद खाया था।
खाने के बाद सत्या ने बिस्तर पिता के पास लगा दिया, खुद भी सोने चली गई।उसने कोई सवाल नहीं किया।
अगले दिन सुबह उठ वह फूलों की मंडी से फूल लेने चली गई ,तब तक परितोष उठा नहीं था।लौट कर आयी तो पारितोष उठ कर बैठा था,अब वो कुछ ठीक लग रहा था,लेकिन बेचारगी उसके चेहरे पर साफ झलक रही थी।उसने सत्या से पूछा तुम क्यों मुझपर दया कर रही हो,मुझे मेरी स्थिति पर छोड़ दो ।
सत्या ने कहा ,मै भी आपका अहसान चुका रही ,मेरे पास आज भी छुट्टे नहीं ,और वह खिलखिला उठी।उसकी मासूम सी हंसी अचानक ही पारितोष के कानों में मिठास सी घोल गई।
वह चुप रह गया।
धीरे धीरे वह खुलने लगा ,रोज़ सत्या अपने रोजाना की खट्टी मीठी बातें बताती ।अब पारितोष भी सत्या के साथ फूलों की मंडी जाने लगा।उसकी मदद भी करने लगा।एक दिन दोनों घाट जा रहे थे ।
अचानक एक महिला पारितोष से टकराई,और उसके हाथ में जो फूलों की टोकरी थी गिर गई।
वह बैठ कर उठाने लगा,तभी कानो में आवाज़ एक पुरुष की ध्वनि आयी ,अंधा है क्या? दिखाई नहीं देता,महिला की ओर मुड़कर उस व्यक्ति ने कहा - 'डार्लिंग तुम्हें लगी तो नहीं'।
परितोष ने सर उठा कर देखा ,वह उसके कॉलेज का मित्र तन्मय था,और वह महिला अनन्या थी।उसका दिमाग भन्ना गया। दिमाग की नसें तन गई थी ऐसा लग रहा था की फट जायेंगी।तब तक सत्या जो आगे थी,दौड़ कर आयी और उसे सहारा दिया।और फिर घर ले आई,आज परितोष के सब्र का बांध टूट चुका था,वह सत्या के कंधे पर सर रख कर फूटफूट कर रोने लगा।
सत्या उसे देखती रही,आज उसके अंदर के जख्म फूट कर बहने लगे थे।आज उसने अपनी जीवन की बंद पन्ने को सत्या के सामने आखिर खोल ही दिया।
उसने बताया कॉलेज में तन्मय और अनन्या दोनों उसके बहुत अच्छे मित्र थे। अनन्या कॉलेज की सबसे खूबसूरत लड़की थी ,हर लड़का उसे पाने के सपने देखा करता था।लेकिन अनन्या पारितोष को पसंद करती थी,कॉलेज से निकलते निकलते ये दोस्ती प्यार में बदल चुकी थी।
तन्मय और पारितोष दोनों ने अपने अपने पिता का बिज़नेस संभाल लिया । बिज़नेस काफी अच्छे से चल रहा था अनन्या भी उसके साथ ,बिज़नेस का काम देखने लगी। दोनों ने एक दूसरे को दो साल का समय दे रखा था,।
अचानक पारितोष की कंपनी नुकसान में जाने लगी।उसके पिता का विश्वासपात्र कर्मचारी जो अकाउंटेंट के पद पर थे,उन्होंने आना छोड़ दिया,पता किया तो वो बिन बताए शहर छोड़ कर चले गए थे,। कुछ कागजात भी गायब मिले, पारितोष ने कोई ज्यादा ध्यान नहीं दिया। लेकिन उसके सारे कहीं से काम नहीं मिल रहा था जबकि ,किसी भी कंपनी के टेंडर से उसकी कंपनीकम से कम कोट करती लेकिन टेंडर तन्मय की कंपनी को मिलता ,तन्मय हर बार बाज़ी मार रहा था।धीरे धीरे कंपनी दीवालिया होने की कगार पर आ गई,रोज़ लेनदार धमकियां देने आने लगे।
एक दिन जब पारितोष घर पहुंचा तो बहुत भीड़ ,उसके घर के आगे खड़ी थी,किसी अनहोनी की आशंका से,उसके कदमों में जैसे उसका साथ छोड़ दिया था,बमुश्किल घर की ओर पहुंचा तो सामने पुलिस ऑफिसर ने बताया कि उसके माता ,पिता ने खुदकुशी कर ली।सामने के पड़ोसी ने पुलिस को ख़बर की,तो पुलिस अभी आयी।
पारितोष के पैर के नीचे की जमीन खिसक गई।पिता उसके संबल थे, किससे वह सलाह लेता ,आंखो के आगे अंधेरा छा गया ,और वह बेहोशी के आलिंगन में चला गया।
जब आंख खुली तो खुद को हॉस्पिटल में पाया।सब कुछ तो लुट चुका था। अनन्या उसके पास थी।तन्मय ने उसे एडमिट करवाया था।
कई दिनों तक वह इस सदमे से उबर नहीं पाए,तन्मय और अनन्या लगातार आते रहे ,उसे ढांढस बंधाते रहे,फैक्टरी बंद हो चुकी थी,वह दिवालिया हो चुका था।
धीरे धीरे कर्ज चुकाने के लिए सारी संपतिया बिक गई।
अनन्या छोड़ कर जा चुकी थी। पिता ने जो फार्म हाउस बनाया था शहर से दूर ,वी भी बिक चुका था।परितोष पागल हो गया ,उसका दिमागी संतुलन बिगड़ गया।गलियों गलियों घुमा करता,ऐसे ही में मुलाकात हुई सत्या से जो उसके बुरे समय की साथी बनी। पारितोष ने अब अपने लिए नौकरी तलाशनी शुरू की।
एक अच्छी कंपनी में उसने अपनी रिज्यूम भेजी और उसे जॉब मिल गई।
आज वो बहुत खुश था , घर पहुंच कर उसने सत्या का हाथ थामा और घाट की ओर चल पड़ा,विश्वनाथ जी के दर्शन किए,और सत्या के साथ नौका विहार करने लगा। सत्या उसे निहार रही थी,कितनी खुश थी ,अपने सपने के राजकुमार को साक्षात पा कर,बाबा भोलेनाथ का मन ही मन शुक्रिया करती नहीं थक रही थी।
दोनों को सत्या के पिता ने आशीर्वाद दिया और सही मुहूर्त देख शादी का दिन नियत कर दिया गया।अब सत्या फूल नहीं बेचने जाती थी।एक दिन कंपनी के काम से परितोष को मिर्जापुर जाना पड़ा,वो वहां काम के बाद बाजार के लिए निकला कि सत्या के लिए कुछ खरीददारी कर ले,अचानक उसकी कंपनी के अकाउंटेंट उसे बाज़ार में मिल गए, परितोष को देख वो नज़रें चुरा कर भागने लगे,परितोष ने दौड़ा कर उन्हे पकड़ा तो ,वो उसके पैर पर गिर पड़े।परितोष की समझ में कुछ नहीं आ रहा था,उसने उन्हें उठाया ,और प्रश्न वाली दृष्टि से देखने लगा।
अकाउंटेंट बाबू ने रो रो कर कहा,- "बाबू हमरा के माफ कर दिहा, हमनी के कारण रउवा के इ हॉल भयिल बा। हम दोषी बानी।"
विस्तार से उन्होंने पारितोष को सारी बात बताई, उन्होंने कहा अनन्या तुमसे प्यार नहीं करती थी ,वो तन्मय का मोहरा थी।तुमसे प्यार का नाटक कर वह तुम्हारी सारी प्रोजेक्ट सीक्रेट तन्मय को बताती थी।कितने की बिड तुम्हारी कंपनी लगाएगी वो सारी जानकारी देती थी ।जिससे तन्मय तुमसे कम की बोली लगाता और टेंडर उसे मिल जाता था।
अकाउंटेंट बाबू कहने लगे ,जब मुझे ये सच्चाई पता चली तो मैं तुम्हारे पास जाने वाला था कि उनलोगो को भनक लग गई और रास्ते से ही मुझे गुंडो से उठवा लिया,और मेरे परिवार के लोगों को मारने की धमकी दी,और मुझे शहर छोड़ कर जाने को कहा।मै बहुत डर गया था ,बाबू रातो रात हमने घर और शहर छोड़ दिया,बड़े साहब की मरने की ख़बर मिली,किस मुंह से आपका सामना करता ,बाबू।कह कर वो फफकने लगे।
पारितोष ने चुप कराया और कहा जो होना था वो तो हो ही गया।किसी को क्या दोष दिया जाए,शायद मेरी किस्मत में यही था।
पारितोष को वो बातें स्मरण हो आईं, जो उसके पिता कहते थे, "मन को हो तो अच्छा ,ना हो तो और भी अच्छा",समय परिस्थिति अच्छे,बुरे की पहचान करा देते हैं।
बनारस लौट वो और सत्या बाबा भोलेनाथ के आशीर्वाद से परिणय सूत्र में बंध गए।

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