बाऊजी का रिटायरमेंट का समय हो गया था ,बाऊजी मेरी शादी जल्द से जल्द कर देना चाहते थे , अब वो कहने लगे थे की वक्त और जिंंदगी दोनो का भरोसा नही , और बिटिया का डोली मे बिठाना का सपना , देखना हर पिता की इच्छा होती है।
मै बाऊजी से कहती थी मुझे शादी नहीं करनी है ,मुझे तो सदा आपके पास रहना , अपने प्यारे बाऊजी के पास।
बाऊजी मेरे जवाब मे कहते की बेटा यही संसार का नियम है। कही न कही तेरा राजकुमार तेरा इंँतजार
कर रहा होगा।
बाऊजी को काकी माँ ने प्रयागराज मे एक रिश्ता बताया ,जो काकी माँ के दूर के रिश्तेदार मुहँबोला भाई का बेटा है।
बाऊजी ने भाई से लड़का देखने जाने की इच्छा जाहिर की , भाई ने भी अपनी सहमति दे दी।
बाऊजी चाहते थे भाई भी उनके साथ चले ,लेकिन ऐनमौके पर भाई को जरूरी काम आ गया ,भाई ने अफसोस जताते हुए मना कर दिया।
भाई ने "बाऊजी से कहा हम किसी दिन ओर चलेंगे ,आप अकेले क्या जाएंगे। "
बाऊजी ने कहा" कोई बात नहीं , सर्वप्रथम काम जरूरी है।"
बाऊजी ने कहा "मै अकेले ही देखकर आ जाऊँगा।"
काकी माँ अपने भाई को फोन करके खबर दे देती है वो सभी लड़के को देखने आने वाले है । बाऊजी उनके घर जाते है देखने को, आदर सत्कार के साथ वो लोग बाऊजी का आवभगत करते है।
अपने बेटे प्रेम से मिलवाते है, प्रेम के पिताजी
का अपना मसाला बनाने का कारखाना है।
उनका बेटा भी उनके साथ कारोबार मे काम देखता है। एक छोटा भाई है ..काफी बड़ा तीन मंजिला का घर। बाऊजी क़ो घर बार और लोग दोनो बहुत पसंद आते है।
बाऊजी ने मेरी तस्वीर दी, रत्नलाल जी को (प्रेम के पिता) । उन्हें मुजफ्फरपुर आने का न्यौता दे देते है।
बाऊजी गदगद होकर , घर आकर सबको बताते है कि उन्हें लड़का और घर दोनो ही बहुत पसंँद आए।
"उन लोगो भी "प्रिति" पसंँद आ जाए तो मेरी बिटिया राज करेगी इतने बड़े घर जाकर।"
सबको जानकर प्रसन्नता होती है सिवाय भाभी के।
भाभी "अपने कमरे मे जाकर बड़बड़ाने लगती है भैया के सामने ,इतने बड़े घर मे बाऊजी अपनी बिटिया को
ब्याहने की सोच रहे है। दहेज़ भी तो उनकी हैसियत के अनुसार देना होगा। कहाँ से आएँगे इतने पैसे ।
कह देती हूँ तुम्हें हम प्रिति की शादी मे कोई मदद नहीं करने वाले।"
भैया ने कहा - "तुमसे पैसे माँग कौन रहा है ?? और ये क्या हमेशा पैसे ..पैसे की रट लगाकर रखती ह़ो तुम
खुद कमाती हो , तुम्हारे कमाए हुए पैसे , क्या मै या मेरा परिवार माँगता है ..नहीं न ..तो अपना मुहँ बँद रखो।
मै कमाता हूँ और बाऊजी भी खुद इतनी हिम्मत और हैसियत रखते है की वो अपनी बेटी.और मै अपनी बहन का ब्याह शानौशौकत के साथ अपने मनमुताबिक कर सकता हूँ ।"
"जब से आई हो कभी भी अपना कोई फर्ज निभाया है तुमने , जब से आई हो हुकुम चलाती आई हो , मेरी बहन ही करती आई है अब तक।"
"तुम्हारी भलाई इसी मे है की अपना चोंच बँद रखो, तुम्हें क्या लगता है, तुम्हारे बारे मे कुछ पता नहीं
सब जानता हूँ मै।"
सुषमा - "तुम्हारी बहन ने बताया होगा और क्या??"
भैया.- "यही तो खासबात है मेरी बहन मे वो कुछ कहती नहीं ,बचपन से जानता हूँ उसे मै लेकिन उसके चेहरे को और उसे दोनो को पहचानता हूँ।"
भैया- "कल लड़के आने वाले है। कल कोई नौटंकी की न तुमने सच्ची मै भूल जाऊंँगा की तुम मेरी पत्नी हो।
अभी तुमने मेरा प्यार देखा है असल रूप तो अब देखोगी मेरा। बहुत बर्दाश्त कर लिया मैने तुम्हें अब और नहीं।"
भाभी अचानक से भैया का बदला रुप देखकर एकदम से चुप हो जाती है। चुपचाप मुहँ घुमाकर सो जाती है।
सुबह से ही घर मे बहुत हलचल थी क्योंकि लड़के वाले मुझे देखने आने वाले थे। भाभी भी फूर्ति से नाश्ता खाना बना रही थी , बाऊजी भैया को मिठाई ,फल बाजार से जल्दी लाने कह रहे थे। घर मे खूब झड़ाई बुहारी चल रही थी।
जोरोशोरो से...लग ही नहीं रहा था ये वही घर है,घर का कोना -कोना साफ सुथरा लग रहा था। आने वालो की आवभगत मे कोई कमी न रह जाए इसलिए बाऊजी और माँ , काकी माँ ,स्वयंँ अपने देखरेख मे कर रहे थे।
फर्श पर गलीचे ,फूलदान मे खूशबूदार रजनीगंधा के
फूल,पर्दा, माँ लगवा रही थी।बार -बार मुझे तैयार होने बोल रही थी।
लड़के वाले के आते ही बाऊजी और भैया ने उनका हाथ जोड़ कर अभिवादन किया। अंदंर लाकर
बैठाया शर्बत पीने को दिया।
मेहमानों के पास ,मै भाभी के साथ.चाय नाश्ता लेकर गई। उन लोगो को प्रणाम किया, चाय नाश्ता दिया
अपने बाऊजी के समीप जाकर बैठ गई।
मुझसे से मिलने प्रेम और उसके माता पिता आए थे।
मैने और प्रेम ने एकदूसरे से बात किया। हमदोनो की रजामंँदी मिलते ही शादी पक्की कर दी गई।
मेरे ससुराल वाले तैयारी के साथ आए थे।
मम्मी जी (सासु माँ) ने शगुन के तौर पर हाथो मे कँगन,सर पर चुनड़ी ओढा दी । आँचल के पल्ले मे गहना,तोहफा और मेवा दिया
मेरे बाऊजी ने प्रेम जी के माथे पर तिलक करके सगुन
मे ग्यारह हजार रुपये दे दिए।
जोरोशोरो से शादी की तैयारीयांँ शुरु हो गई । मेरी शादी वाला दिन आ ही गया। जिसका इंतजार हर लड़की और घरवालों को रहता है।
मेरी आँख भर -भर आई जैसे - जैसे हर रस्म निभाई जा रही थी।
जयमाला, सात फेरा , कन्यादान , सिंदूर दान का रस्म हर्ष और उल्लास से सब हुआ पूरा।
अंतिम बार देहरी पूजाकर इस घर के लिए हुई मै पराई।
ओ बाबा दुनिया ने ये कैसी रीत है बनाई
क्यों बेटी के हिस्से मे आई ये जुदाई
जब समय विदाई का आया
बेटी का कलेजा मुंँह को आया
ओ माई, ओ भाई ,ओ भौजाई
सुनो मेरी सखी सहेलियों
अब इस घर के लिए हुई मैं आज से पराई
ओ बाबा दुनिया ने यह कैसी रीत बनाई
स्नेह दुलार से पाला पोसा
चहकती चिड़िया का नाम दिया
क्यों अनजानो कि नगर में भेज रहे हो
ओ बाबुल तुम बिन कैसे रहुँगी
जिगड़ का टुकड़ा बनाकर
काहे जिगर से दूर कर रहे हो
छुटपन मे हाथ पकड़कर चलना सिखाया
उसी हाथ को एक अंँजान के हाथ थमा रहे हो
रोते रोते प्रिति की हिचकी बँध गई।
बाबुल गले लगाकर कहने लगे
ना मत रो मेरी लाडो
बाबुल रोए ,भाई रोए ,रोए माई
नयनो से झर - झर नीर बरसे
विधाता का यही दस्तूर है बिटिया
हर बेटी को जाना होता है ससुराल
बसाने एक नई दुनिया
जा बेटी आशीष ले जा सदा सुहागन रहना मेरी लाडो
फूटफूटकर गले लगाकर बाप बेटी खूब रोते है
उपस्थित सभी मेहमान बहुत भावुक हो जाते है। सबकी आँखे भींग जाती है। दोनो समधी हाथ जोड़कर
एकदूसरे से गले लगकर विदा लेते है।
मै प्रेम के गठबंधन मे बँधकर ससुराल पहुंँचे जाती हूँ।
क्रमशः..............

0 टिप्पणियाँ