ज़हीन हो हसरतों का सामान लगते हो।
हरकतों  से तुम बहुत नादान लगते हो।

खुश रहने की कोशिश जितनी कर लो।
चेहरे से  तुम  बहुत परेशान लगते हो।

होठों से झरते हो बेशक फूलों से अल्फ़ाज़।
दिल  से  तुम कोई  सख्त  इंसान लगते हो।

दिल कितना भी दुखाया होगा अपनों का।
पर आज भी  तुम उनकी जान लगते हो।

चुप होकर क्यूँ बैठे हो यूँ तन्हा ,उदास।
भरी महफ़िल की उम्दा शान लगते हो।

कसीदे कितने भी पढ़ लो ईमान के।
मेरी नज़र में बहुत बेईमान लगते हो।

दिल की लगी है या है कोई दिल्लगी।
मुझे तुम एक मायूस इंसान लगते हो।

स्नेहलता पाण्डेय"स्नेह"
नई दिल्ली