भर जाता है हर वो जख्म जो दुनिया देती है ,
अपनो का दिया दर्द ही नासूर बन जाता है।
क्या ज़िक्र करू उन लोगो का,
ज़िन्होने मरहम मे भी नमक मिलाया था।
डर लगता है अब तो अपनो के नाम से भी ,
अच्छे तो वो थे ज़िन्होने गैर होकर भी गले लगाया था ।
अकेले ही चलना पड़ता है दुनिया की भीड मे,
भरोसा जिस पर करके चले थे उसने तो अपना दामन पहले ही छुडाया था!
श्वेता अरोड़ा

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