प्रियतम मेरा हर जगह क्यों जाऊं मैं, कहीं
अंदर रूख किया जो मुरली बजा रहा वो।
तन मन की सुध छोड़क मेंर भागी, प्यारा नजर वो आया ।
मैं देखी रही थी एकदम से वह प्यार से मुस्कुराया।
मैंने कहा वह प्रियतम ,कितना सितम किया है ।
ऐसा रचा ये नाटक तूने, मुझको हैरान किया है।
बोला वह मुस्कुराकर, मैं तो तेरे सदा साथ था।
मेरी ही सब झलक थी प्यारा में आप ही था।
बहता था रोज आंसू ,जिसके लिए मुरारी।
दीदार जब हुआ तो ,एकदम चढ़ी खुमारी।
कितना हसीन है तू ,सूरत यह प्यारी प्यारी।
ज्योति स्वरूप मेरा ,सत चित आनंद में मैं गाऊं।।
दिल की कलम से
मधु अरोड़ा

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