भावनाओं के समंदर में डुबकी लगाती हूँ,
तब कहीं जाकर शब्दों के मोती खोज पाती हूँ।
बिखर न जाएं ये अनमोल मोती,
इसलिए कलम के जरिये पन्नों पर सजाती हूँ।।

अंतर्मन में विचरण करते हुए जब हजार शब्दों को पाती हूँ,
तब  कलम द्वारा और उन्हें कबिता, कहानी और छंद का रूप देती हूँ,
निराकार भावनाओं को जो देती है साकार स्वरूप,
उस कलम से ही मैं अपने विचार साकार कर पाती हूँ।।

प्रेम की स्याही में रंग कर कभी सपनों को सजाती हूँ,
बन कर विरहनि के मन की व्यथा अश्रुओं में बह जाती हूँ,
सवांर देती हूँ किसी का जीवन तो किसी को फांसी के तख्ते तक पहुंचाती हूँ,
हा मैं कलम हूँ एक होकर भी अनेकों रूपों में पाई जाती हूँ

स्वरचित एवं मौलिक
शीला द्विवेदी "अक्षरा"
उत्तर प्रदेश