मुझ में रूप न रंग
क्यों मेरे दीवाने हो ?

मुझ में अदा न नज़ाकत
क्यों आगे - पीछे घूमते हो ?

मुझ में नफ़ासत न लियाक़त
क्यों नखरे मेरे सहते हो ?

मुझ में शऊर न संजीदगी
क्यों पलकें बिछाए रहते हो ?

इश्क की राहों से मैं न गुजरती
फिर क्यों चिराग जलाए बैठे हो ?

नजर भर कर भी तुमको नहीं देखा
क्यों आस लगाए बैठे हो ?

तुम्हारी इन्हीं बातों से
भीगने लगा है मन ।

झुकने लगी हूं मैं
मानने लगा है अंतर्मन ।