आनन्द गाँव नाम का एक गाँव था ,इस गावँ मे  मजदूर वर्ग के लोग रहते थे,रोज कमाते रोज खाते ,अपना परिवार चला रहे थे सब खुशी खुशी ।सबके पास पेट के सिवा कुछ नहीं था पर सब खूश रहते थे ।
उसी गाँव मे रामधनी नाम का एक आदमी भी था ,उसकी बेटी सुनहरी थी ,वो बहुत ही खूबसुरत थी सूरज की पहली किरण की तरह  वो लगती नही थी की वो गरीब घर से है ,बिल्कुल अपने नाम की तरह थी एक दम सोने जैसी ,सब उसके आगे पीछे घूमते थे।

आनन्द गाँव से सट कर एक गाँव और था जिसका नाम राय विला गाँव था उस गाँव मे सब राय ही थे और सब पैसे वाले ,उस गाँव में शान शौकत थी पर प्यार नही था ।सब एक दूसरे से जलते थे ,आनन्द गाँव के मजदूर भी यहा काम करते थे ।
एक दिन संदीप नाम का लड़का जो राय विला गावँ का था वो आनन्द गाँव गया मुरली से मिलने उसे कूछ काम था मुरली से ,.................काम हो जाने के बाद वो जा ही रहा था की उसे एक प्यारी-सी हसीं सुनाई दी उसने पलट कर देखा तो उसे एक खूबसूरत सी लड़की दिखी ,संदीप उसे देखतें ही रहा,उसने इतनी सुन्दर लड़की अब तक नही देखी थी ,तभी मुरली ने कहा ओ
साब जाओ।
वो आ तो गया पर वो उस लड़की के बारे मे ही सोचता रहा।
अगले दिन उसने अपनी बाइक ही खराब कर ली और पहुच गया मुरली के पास उसकी नजरे तो बस उस लड़की को ही ढूँढ रही थी, तभी वो दिख गई ,,संदीप बहुत ही खुश हुआ ।
अब तो वो रोज ही आने लगा एक दिन उसे पता चला कि उसका नाम सुनहरी है।
एक दिन सुनहरी मुरली से अपने बापू की साईकिल ठीक करा रही थी तभी संदीप आ गया ,सुनहरी ने संदीप को देखा तो वो भी उसकी दिवानी हो गई,संदीप भी लम्बा ,चौडा , गोरा,गठीला बदन  का स्मार्ट बन्दा था ।दोनो ही एक दूसरे को देख के मुस्कुराए।आखों ही आखों में इशारे भी हो गए ।
अब दोनो मिलने लगे अपने दिल का हाल बयां करने लगे।
सुनहरी हमेशा संदीप से कहती थी,की हमे यहा कोई नहीं रहने देगा हम दोनो आसमान पर अपना घर बनायेगे।और संदीप उसकी बातों में खो जाता था जब जाने का समय होता तो दोनो एक दूसरे को कस के पकड़ लेते ,पर जाना तो है।
छूप छुप के कितने दिन मिलते एक दिन राय विला के एक आदमी ने देख लिया और जाकर संदीप के पिताजी को बताई ,संदीप के घर के दो चार आदमी आए और दोनो को पकड़ लिया और दो चार सुनहरी को थप्पड़ लगा दिया आगे से न मिलने की हिदायत दी ।संदीप को भी पकड़कर घर ले गये ।
कुछ अदमी लाठी दडे ले के राम धनी के झोपड़ी मे पहुचे और बोले अपनी बेटी को बता दे की बडे घर के लड़कों को ना फसाये वरना काट देगे ,रामधनी की भी 
पिटाई की ,तब सुनहरी आई हाथ जोड़कर बोली छोड दो मेरे बापू को मै अब नही मिलुगी संदीप से।
दो दिन गूजर जाने के बाद दूसरी रात को वो घर से भाग गया और मुरली के पास जा के हाथ जोड़ के बोला बस एक बार सुनहरी को मंदीर वाले पहाड़ी पर भेज दो मै वही जा रहा हू बस ये आखरी हैं,फिर हम दोनो छुप -छूप के नही मिलेगे ,मुरली सब जानता था की ये दोनो एक दूसरे से बहुत ही गहरा वाला प्रेम करते है वो मान गया। और चुपके से जा कर सुनहरी को बताया ।
सुनहरी भी क्या करती दिल के हाथो मजबुर थी वो रात के अन्धेरे मे चली गई,संदीप भी पहुच चुका था ,दोनो एक दूसरे से ऐसे मिले जैसे की कितने जन्मो से नही मिले ,दो दिन की जुदाई कितनी भारी पड़ रही है सुनहरी 
संदीप बोला ,क्या करे हम  ,सुनहरी बोली ।
झट से संदीप बोला तू बोलती थी ना ये लोग हमे नही मिलने देगे ,आसमान पे अपना घर बनाए    गे ,अब बारी आ गई है हम जी तो ना पाएगे साथ में लेकिन आसमान पे साथ जा सकते है ,तू तैयार है चलेगी मेरे साथ ,,,,,,,,,हा चलूंगी ,चलूंगी संदीप दोनो एक दूसरे को जी भर देखते है ,खूब रोते है ।
औ..........और एक दूसरे का हाथ थामे पहाड़ी से कूद जाते है ।
अपना घर बनाने के लिए दुर कही  आसमान पर जहा कोई भेद भाव नहीं,कोई बड़ा या छौटा नही सब एक बराबर है अपनी प्यार की दुनिया बसाए हुए।