यह कहानी ओशो की पुस्तक से ली गई है । जो मैं आपके साथ साझा कर रही हूं । मैं जब भी इसे पढ़ती हूं, हमेशा मेरी आंखें नम हो जाती हैं । यह कहानी मुझे बहुत पसंद है । उम्मीद करती हूं, आप लोगों को भी पसंद आएगी ।
'सरमद' का शाब्दिक अर्थ है - आदि और अंत से रहित । सरमद, आर्मीनिया का यहूदी था । उसका जन्म ईरान के प्रसिद्ध व्यापार केंद्र काशान में हुआ था । आपने मुल्ला सदरूद्दीन शीराजी और अबुल कासिम फ़िंदर्सकी से अरबी- फारसी की शिक्षा ली । तौरात, जबूर, बाइबल और कुरान को अर्थ सहित कंठस्थ किया तथा जागीरदार पिता के दबाव में व्यापार के लिए हिंदुस्तान आए ।
सन 1632-33 ईस्वी में सरमद हिंदुस्तान के थट्टा नामक स्थान पर पहुंचा । एक-दो वर्ष थट्टा में रहने के बाद सरमद लाहौर आ गया । लाहौरवासियों में वह बड़ा लोकप्रिय था । वह बड़े प्रवाह के साथ शेर कहता था और शुद्ध फारसी बोलता था । 1646 में सरमद हैदराबाद पहुंचा । वहां भरी महफिल में आध्यात्मिक ज्ञान से पूर्ण अपनी रुबाइयां सुनाता । लोग उसके दीवाने थे । 1654 में वह दिल्ली आ गया, जहां वह पहले ही काफी प्रसिद्ध हो चुका था ।
उस समय शाहजहां के शासन के अंतिम दिन थे । शाहजहां ने सरमद को अपने बड़े बेटे, दारा शिकोह का शिक्षक नियुक्त कर दिया । दारा सूफी संतो की बड़ी कद्र करता था । वह सरमद का अनन्य भक्त बन बैठा । धीरे-धीरे सरमद के शिष्यों की संख्या बढ़ने लगी । दारा शिकोह की शिक्षा समाप्त होने के बाद सरमद ने सांसारिक कार्यों से मुंह मोड़ लिया । वह दिल्ली की जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर बैठकर, अपने खुदा की याद में डूबा रहता ।
शाहजहां ने अपने तीन बेटों-शुजा, मुराद एवं औरंगजेब को अलग-अलग प्रदेशों का गवर्नर बना दिया और दारा को दिल्ली में रखा । सत्ता के लालच में औरंगजेब ने कई चालें चली और तीनों भाइयों को मरवा कर सम्राट बन बैठा । दिल्ली में औरंगजेब हर शुक्रवार को जामा मस्जिद जरूर जाता था । उसके साथ दिल्ली के तत्कालीन सर्वोच्च न्यायाधीश काजी मुल्ला कवी भी रहते थे । सीढ़ियों पर नंगे पड़े सरमद को देखकर उन्हें बुरा लगा, तो बादशाह से कहा,
"इस नंगे फकीर को देखकर 'वुजू' टूट जाती है ।"
बादशाह ने नंगे रहने का कारण पूछा तो सरमद ने स्वरचित रुबाई में उत्तर दिया -
"जिसने तुझे यह ताज-ए-जहांबानी दिया है,
उसने मुझे सामान-ए-परेशानी दिया है,
देखा जिसे पुर ऐब, दिया उसको लिबास,
बे एबों को ये तुर्र-ए- उर्यानी दिया है ।"
सरमद ने अपने जीवन में 'ला इलाह' से अधिक कलमा नहीं पड़ा । जिसका अर्थ है - नहीं है कोई पूज्य । इससे नास्तिकता की ध्वनि निकलती है । जब औरंगजेब के दरबार में उससे कलमा पढ़ने को कहा गया तो 'ला इलाह' पढ़कर चुप हो गया । इस्लाम धर्म में पूरा कलमा इस प्रकार है - "ला इलाह- इल-अल्लाह मुहम्मदर्रसूल अल्लाह"
अर्थात नहीं है कोई पूज्य सिवा अल्लाह व अल्लाह के रसूल मुहम्मद के । जब मौलवियों ने उससे पूछा तो उसने कहा -
"मैं अभी तक अभाव के समुंदर में गोते लगा रहा हूं । अभी मैं साक्षात्कार की सीमा तक पहुंचा ही नहीं । ऐसी हालत में अगर मैं 'ला इलाह-इल-अल्लाह' कहूं तो यह सरासर झूठ होगा । जो बात दिल में नहीं है उसे जबान पर कैसे लाया जा सकता है ।"
उस दिन बादशाह खामोश रह गया । अगले जुमे को मुल्ला कवी ने एक फतवा जारी किया कि "सरमद मुसलमान नहीं, यहूदी है, आधा कलमा पढ़ते हैं, मुहम्मद को रसूल नहीं मानते, लिहाजा उन्हें कत्ल कर देना चाहिए ।"
लेकिन बादशाह ने उस पर हस्ताक्षर के लिए अगले दिन का समय दिया । उसी रात बादशाह ने सपने में देखा कि जन्नत में एक खूबसूरत महल है जिस पर लिखा है, "शहजादी जेबुन्निसा का खरीदा हुआ महल ।"
औरंगजेब उसमें जाना चाहता है लेकिन पहरेदार रोक देते
हैं ।
अगले दिन बादशाह ने अपनी 12 वर्षीय बेटी जेबुन्निसा को बुलाकर पूछा कि "जन्नत का महल क्या है ?"
उसने कहा - "सरमद एक मिट्टी का घरौंदा बनाकर बैठे थे ।मैं उधर से गुजरी तो मैंने पूछा क्या करते हो ?
वे बोले, 'जन्नत का महल बनाता हूं ।'
मैंने एक हुक्का तंबाकू के बदले उस महल को खरीद
लिया ।"
इतना सुनते ही औरंगजेब बेचैन हो गया ।
अगले जुमे को उसने सरमद से पूछा, "जन्नत का एक महल हमें भी बेचोगे ?"
सरमद ने कहा, "खरीदना-बेचना रोज नहीं होता ।" औरंगजेब गुस्से से तमतमा गया और बोला, 'नंगे पड़े रहते हो और कंबल अलग जमीन पर फेंक रखा है ? यह क्या तमाशा है ?"
"कंबल एक ही है, इससे किसी एक का ही 'ऐब' छिपाया जा सकता है ।' सरमद ने उत्तर दिया ।
औरंगजेब ने कहा, "दूसरों को छोड़ो, अपने बदन को
ढको ।"
सरमद ने उदारता पूर्वक कहा, "तो कंबल वहां से उठाकर मेरे बदन पर डाल दें ।"
औरंगजेब ने जैसे ही कंबल उठाया उसे अपने तीनों मृतक भाइयों के कटे हुए सिर दिखाई दिए ।
सरमद ने फिर पूछा, "बता बादशाह, तेरा ऐब छुपाऊं या अपना बदन ? कंबल तो एक ही है ।"
इस घटना के बाद सरमद से मिलने वालों की भीड़ उमड़ पड़ी ।
मुल्ला-मौलवियों ने कहा, "इस्लाम खतरे में आ गया है ।"
औरंगजेब ने सरमद को खत्म करने के फरमान पर हस्ताक्षर कर दिए ।
अपनी मौत से एक दिन पहले लोगों ने सरमद को यह शेर पढ़कर हंसते हुए देखा
"देर अस्तु कि आफसादए मंसूर कुहन शुद,
अकनू सरे नौ जलवा दिहम दारो रसन रा "
अर्थात -
"बहुत दिन हो जाने से मंसूर का किस्सा पुराना पड़ गया है । मैं सूली पर चढ़कर उसे फिर से ताजा कर रहा हूं । दार और रसन का जलवा फिर चमका कर दिखाता हूं ।"
किसी शहजादे की बरात में भी ऐसी क्या भीड़ रही होगी जैसी उस दिन देखने में आई । जब सरमद को वध स्थल पर ले जाया जा रहा था । भीड़ का कोई ओर-छोर नहीं था ।
सरमद साहब उस समय अपने प्रियतम से निवेदन कर रहे थे - "मुझको तेरे इश्क के जुर्म में मारा जा रहा है, जरा तू भी तो अटारी पर चढ़कर देख, कितना मजेदार तमाशा है ।"
सिर कटते ही, सरमद ने पूरा कलमा पढ़ा और अपनी कटी हुई गर्दन हाथों में लिए मस्जिद की सीढ़ियां चढ़ने लगे । तभी उनके रूहानी पेशवा सब्जवारी की आवाज आई - "सरमद क्या करते हो ?"
कटी हुई गर्दन ने उत्तर दिया - "अल्लाह से इंसाफ मांगने जा रहा हूं ।"
"नहीं, सरमद ! तुम शहादत का दर्जा चाहते थे, मिल गया । अगर मस्जिद के आंगन में तुम्हारे खून की एक बूंद भी गिरी तो कयामत आ जाएगी । लौट आओ ।"
दिल्ली की जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर उनकी समाधि आज भी उनकी शहादत की दास्तान सुना रही है ।
यह कहानी मैंने ज्यों की त्यों लिखी है । मुश्किल शब्द होने की वजह से कुछ गलतियां हो सकती हैं । जिसके लिए मैं क्षमा चाहती हूं ।

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