नज़रों में  सबकी.. चुभने,  लगा हूं   मैं   ।
जबसे कड़वा सच. बोलने, लगा हूं   मैं  ।।

तेरी आंखों  में......चुभने, लगा हूं    मैं   ।
दिया  हूं  जलता,   बुझने,  लगा हूं   मैं   ।।

मंदिर मस्ज़िद  के चर्चे होने,लगे कुबकू  ।
अब अपने ही घर में डरने, लगा हूं  मैं   ।।

जाने कब बदल जाए यहां हवा का रुख।
कुछ  भी  कहने  से डरने,  लगा हूं  मैं ।।

अगर खफा हों, सनम  मनाने,  लगा हूं मैं ।
रुख इश्क़ की हवा का बदलने,लगा हूं मैं।।

प्यारी  बातें  ही  नहीं  करने,  लगा  हूं  मैं ।
प्यार  भी  तुझी  से   करने,   लगा  हूं  मैं ।।

ख़ाक...  तेरे  इश्क़ में  होने,  लगा  हूं  मैं  ।
वक़्त की मुट्ठी  से फिसलने,  लगा  हूं  मैं ।।

यूं  ही सबकी... ख़बर  लेने,  लगा  हूं  मैं ।
फ़िक्र तेरी...... बहुत  करने,  लगा  हूं  मैं ।। 


भूपेन्द्र चौहान,