बरसों बीत गए घर की याद सताती नहीं है।
मां की बूढ़ी आंखें तेरे इंतजार में पथरीली हो गई क्या तुझे घर की याद आती नहीं है बचपन से देखा था तुझे पिता के संग मेले में घूमने जाते हुए क्या तुझे पिता की याद सताती नहीं है घर भी तुझे ढूंढती है क्या घर के आंगन तुझे सताती नहीं है। घर में अक्सर लोगों से सुना है अब तू बदल गया है क्या तुझे घर की याद सताती नहीं है पहले तू राखी पर आता था अब तो साल में दो-तीन बार ही आता है क्या तुझे घर की याद आती नहीं है। त्योहारों में मैं भी तेरा इंतजार करता हूं सब भाइयों बहनों के बीच मस्ती देख कर मैं भी झूम उठता हूं आम की बगिया से आम तोड़ते हुए देख कर मुझे अच्छा लगता है क्याघर की याद सताती नहीं है। कभी -कभी मां तेरे लिए रोती और तड़पती है मै तेरी बेरुखी से मैं तड़प उठता हूं क्या मां की याद सताती नहीं है। सुना है अब तु बाल बच्चे वाला हो गया अब तो बरसों बीत गए घर आते नहीं हो। मां की मृत्यु पर इकट्ठे पहली बार हुए थे भाई बहनों की बातचीत सुनकर मैं भी झूम उठा था सुना है घर के बंटवारे होने वाले हैं मैं भी विचलित हो उठा था। जिन पिता ने सपने बुने थे घरों का क्या घर का टुकड़ा हो जाएगा। जिस दिन घर की दीवारों को तोड़ा गया दर्द से में चिल्ला उठा था मैं। घर की मालिक की याद सताती है मुझे जिन पिता ने बड़े नाज से घर को सजाया था क्या भाइयों के बंटवारे में घर की कद्र ना करोगे। तेरे पिता की मृत्यु शैया पर लेटे घर देखने की इच्छा मैंने भी देखा है उनकी तड़पती बेचैनी मैं मेरे भी आंसू बहुत टपकेहैं । इतना बेरहम हो गया क्या घर के टुकड़े करते हुए हाथ कांपते नहीं है।.....
सपना कुमारी बिहार पटना

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