मै बहुत रोई ,मैंने बाऊजी को बहुत उठाने की कोशिश
की देव मगर वो नहीं उठे देव
प्रिति देव को बताते बताते ही खूब जोर से रोने लगती है। देव की आँखे भी नम हो जाती है।
देव प्रिति को चुप होने के लिए बोलता है। होनी को कोई भी नहीं टाल सकता.है , ये नैसर्गिक है , इसे आपको और मुझे दोनो को ही स्वीकारना होगा।
प्रिति चुप होकर एक गिलास पानी पीती है।
देव को फिर बताना शुरू करती है ,
मुझे मनु भैया आकर गले लगाते है और कहते है तू चुप होजा ,तेरे भाई है न तेरे पास ,सदैव तेरे साथ रहेगा प्रेम जी के भी आँखो से आशु बह रहे थे ,शायद उन्हें भी  अपने पापा जी की याद आ गई होगी।
भैया ,प्रेम जी ,सभी बड़े जन ,बिरादरी के लोग दाह संस्कृति की तैयारी मे जुट गए। मुझे मेरी  माँ के पास जाने की हिम्मत ही नहीं हो रही थी, मुझे भाभी पकड़ कर माँ के पास लेकर गई ..माँ मुझे देखते ही चीत्कार करके रो पड़ी ..ऐ बिटिया कैसे रहीबे हम तौहार बाबूजी के बगैर ..ऐसे मेरी अवस्था नही थी कि मै माँ को दौड़कर गले लगा पाऊँ ,मै होले से माँ को गले लगाकर उनसे लिपट गई ,हम माँ बेटी फफकर रोते रहे 
मेरे बाऊजी को अर्थी पर लेटाया गया ..उनका चेहरा इतना जीवंत लग रहा था ,ऐसे लग रहा था जैसे सोए हुए हो गहरी नींद मे , बस अभी थोड़े देर मे उठकर मुझे आवाज देंगे "बिटिया"..विश्वास ही नही हो रहा था देव कि वो अब नहीं रहे। अब आऊँगी तो मुझे मेरे बाऊजी नहीं दिखेंगे ..रो रोकर मै बेहाल हो गई थी मुझे चक्कर आने लगे ,मै गिरती उससे पहले मुझे प्रेम जी ने आकर संभाल लिया ,पानी पिलाया और थामकर खड़े रहे। विधी विधान से मेरे बाऊजी की अंतिम विदाई हो गई। घर आँगन सूना हो गया ,मेरी आँखो के सामने बचपन तैरने लगा, कैसे मै दोड़कर बाऊजी के गले लग जाती थी। कैसे मै जीऊँगी उनके बिना सोचकर ही मेरा मन टूट रहा था , बाऊजी की चिता ठंडी हुई नहीं थी, कि इधर भाभी को प्रोपर्टी की चिंता हो गई।
वो आकर मुझसे बोलती है हम तुमसे एक बात पूछ रहे है देखो तुम बुरा मत मानना ..
मेरी तो मन ऐसे ही व्यथित था।
फिर भी मैने भाभी से बोला बोलिए ??
वो थोड़ा हकलाते हुए मुझसे कहती है, "बाऊजी तुमका कछु रूप्या पैसा या कछु तमरे नाम जमा करके गए ..ऊ का है न अभी उनका बारह दिन , छमाई उ सब पंडित जी को दान दक्षिणा, परिवार मे प्रसाद खिलाएंगे तो पैसा तो खर्चा होगा न।"
मै उनकी बात सुनकर अचंभित हो जाती हूँ। मै उनका चेहरा घूर करके देखती हूँ , लेकिन उनके चेहरा पर अपने कहे बात पर जरा सी भी लाज शर्म के भाव नहीं थे। मैने उनसे कहा पहली बात ना तो बाऊजी हमका रुपया पैसा देकर गए है, ना ही हमे चाहिए।
और अगर देते भी तो तुमका उससे क्या..बेटी हूँ उनकी हक है मेरा..आपकी इतनी हिम्मत कैसे हुई हमसे पूछने की..
भाभी ने तैस मे कहा "काहे कि तुम उनकी बेटी नहीं हो नातिन हो"..सुनकर मेरे कानो को विश्वास नहीं हुआ ,मैंने.सोचा ये पैसो की लालच मे इतनी अँधी हो गई है गुस्से के मारे बक रही है।
मैनै उनके कंधो को पकड़कर झकझोर कर बोला ,होश है आपको ,आप क्या बोल रही हो..
भाभी " मै बक नहीं रही हूँ सच कह रही हूँ जाकर पूछलो माँ से ,जिसे तुम मौसी बोलती हो न वही 
तुमरी जन्म देने वाली माँ है समझी।".
वो कहकर  , दनदना कर कमरे से चली जाती है।
मै समझ ही नहीं पा रही थी ,मेरे साथ हो क्या रहा है 
मेरी तो रूलाई छूट जाती है , मेरे बाऊजी ..मेरे नहीं है।
मै रोती हुई माँ के पास जाती हूँ ...माँ ...माँ कहकर पुकारती हूँ , मै माँ के पास बैठकर.उनकी ढुडी को उठाते.हुए रोते रोते बोलती हूँ , माँ ई भाभी का कह रही है मै आपकी बेटी नहीं हूँ बाऊजी मेरे पिता नही है...
माँ ने कहा ,तुमका किसने कहाँ ?? तू हमरी बिटिया.है अपने हाथो को दिखाकर माँ कहती है ,इन्हीं हाथो से मैने और बाऊजी ने तुझे पाला है , माँ मेरे हाथो को चूमकर ,मेरे सर को ,पीठ को सहलाती हुई कहती है।तब तक मे भाभी आ जाती है आकर  बोलती है कब तक सच छुपाकर रखेंगी ,काहे नहीं सच बता देती है कि स्नेहा दी ही इनकी जन्म देने वाली माँ है।
जिन्हें मै हमेशा मौसी बोलती आई.हूँ वो मेरी जन्म देने वाली माँ है। इतने मे ही स्नेहा माँ आँखो मे आँसू भरकर मेरे पास आकर मुझसे माफी माँगने लगती है और कहती है मै ही वो अभागन माँ हूँ ,जिसने अभाव की वजह से , दो बेटी की पालन पोषण करने मे असमर्थ थी इसलिए तुझे हमेशा.के लिए माँ और बाऊजी को दे दिया, तेरी गुनेहगार मै हूँ कहकर रोते हुए जमीन पर मेरे पैरो के पास बैठकर रोने लगती है। मैने स्नेहा माँ को  उठाया और उनको गले लगाकर कहा मुझे आपसे कोई शिकायत नहीं है ,परिस्थिति के अनुसार आपने फैसला लिया , मैने हाथ जोड़कर स्नेहा माँ से कहा आपने भले मुझे जन्म दिया है लेकिन मै हमेशा अपने
माँ बाऊजी की ही बेटी रहूँगी। मुझे कोई रूप्या पैसा से मोह नहीं है लेकिन ये हक मुझसे कोई छीन नही सकता है। स्नेहा माँ ने कहा बेटा तेरी जैसी इच्छा। लेकिन अब मेरी स्थिति सामान्य है। अब से तेरा दो मायका है।
मैंने सर हिलाकर हाँ कहा ,मै ,माँ और स्नेहा माँ सभी अपने आँसू पोंछते हुए एकदूसरे से गले लगते है।
घर की साफ सफाई हो जाती है। माँ भी नहा लेती है।
भाई ,प्रेम जी , मुझे जन्म देने वाले पिता सभी घाट से आ जाते है । तब तक प्रसाद भी बाजार से बनकर आ जाता है।
सभी को प्रसाद खिलाते है। सभी प्रसाद लेकर सांत्वना
देकर चले जाते है।
मुहँ मे निवाला रखते ही , बाऊजी को याद करके हम दोनो भाई बहन की रूलाई फूट जाती है। हम दोनो 
गले लगकर आँसूओ मे भींग जाते है। जैसे तैसे हम खाते है ,माँ की तबीयत ज्यादा ठीक नहीं रहती है , दवाई भी लेनी रहती है ,तो माँ का मन तो नही था, मगर जैसे तैसे माँ को भी खिलाते है।
प्रेम जी मनु भैया के साथ मिलकर सारा काम निपटाते है। और फिर जाने के लिए अनुमति लेते है। 
मनु भैया ने कहा प्रेम जी से प्रिति को यही छोड़ जाओ। लेकिन प्रेम जी ने कहा आठवां महीना चल रहा है। फिर आ जाएगी लेकिन अभी यहाँ रहेगी तो बाऊजी की याद मे रोती रहेगी और इसकी तबियत खराब हो जाएगी।
भैया भी विवश हो गए , ना रोक पाए ,ना कुछ कह पाएँ। माँ दवाई लेकर सो गई थी। मै स्नेहा माँ से ,माँ का ख्याल रखने कहकर चली जाती हूँ।
मुझे और प्रेम जी को घर पहुंचने मे रात के दस बज जाते है।
रास्ते मे ना प्रेम जी मुझसे कुछ बात करते है ना मै। गाड़ी की खिड़की से मै आते जाते रास्ते देख रही थी , और आँखो से आँसू निरंतर बह रहे थे।
घर पहुँचकर मै अपने कमरे मे जाकर निढाल होकर बिस्तर पर पड़ जाती हूँ , एकबार दिल खोलकर चिल्ला कर रोती हूँ , मेरी रोने कि आवाज सुनकर प्रेम जी भागकर आते है, मुझे अपने सीने से चिपकाकर गले लगा लेते है ,कहते है "मेरी प्रिति इतनी समझदार है फिर भी ऐसे कोई रोता है क्या?? ..हमारा बच्चा भी डर जाएगा ,उसे भी संताप होगा अगर तुम ऐसे रोओगी तो बोलो यही चाहती हो तुम?? ..नहीं न" 
मुझे चुपकराकर पानी पिलाकर कहते है अब रोना नहीं मै खाना लेकर आता हूँ ।मैनै कहा भी उनसे मुझे भूख नहीं है , लेकिन उन्होंने मेरी एक बात भी नही मानी ..बोला यूँ गया और यूँ आया.वो जाते उससे पहले ही बिट्टू दी खाना लाकर दे देती है।
मेरा खाने का बिल्कुल मन नहीं था ,इनकी जिद्द के आगे मै हार गई ..खाना खाने बैठी तो हाथ थाली मे घुमाती रह गई मगर मुझसे खाया नहीं गया। प्रेम जी ने मेरे हाथ से थाली ली मुझे खुद अपने हाथो से खिलाने लगे। उनको भी ज्यादा भूख नहीं थी तो हम दोनो ने साथ मे ही थोड़ा थोड़ा खाना खा लिया ,पानी पिलाकर दवा खिलाई। 
लाईट बँद करके मुझे आँख बँध करके सोने को कहा
लेकिन नींद मेरी आँखो से कोसो दूर थी। मेरे जीवन मे हो रही उथल पुथल से मै बेहद बैचेन थी।
कभी इस करवट तो,कभी उस करवट लेकर सोने की कोशिश करती रही । मुझे दाएँ बाएँ करवट लेता देख   और.मेरी बैचेनी को समझ कर हौले से वो मेरे करीब आए और खींचकर मुझे अपनी बाहो मे समेटकर आहिस्ता से थपकाकर सुलाने लगे। मुझे बहुत सूकून मिल रहा था ..रो रोकर मेरा सर दर्द दे रहा
था। उनका प्यार भरा स्पर्श जादू का काम कर रहा था 
मै कब नींद की आगोश मे समा गई मुझे पता ही ना चला। 


क्रमशः...........