आधुनिक युग में धन ही जीवन का आधार है,
धन  है  तो  रिस्ते नाते धन  से  ही  सत्कार है।।

चलती है धन से रोजी रोटी इक्षाएँ पूरी होती है,
रक्षा होती धन से धर्म की भिक्षुओं की झोली भरती है।
धन से ही जीवन में हम तीरथ करें हजार,
धन है तो है रिस्ते नाते धन से ही  सत्कार है।।

सुखी जीवन का आधार धन ही होता है,
बिन धन के निर्धन का कोई पालन हार न होता है।
धन वालों की पूछ यहां निर्धन का कोई न पुछनहार है,
धन है तो है रिस्ते नाते धन से ही सत्कार है।।

$प्राचीन युग में धन$

सदियों पहले जीवन में शिक्षा पहला धन होता था,
संस्कार पनपते जिस घर में वो घर धनवान कहता था।
मानवता का पाठ पढ़ाये वो अपना परिवार है,
कोई महत्व न उस घर में धन का जहां प्रेम और सद्भाव है।
धर्म बड़ा था धन से जग में ऐसी शिक्षा मिलती थी,
तज कर सारे महलों के सुख राम के संग सीता चल दी थी।
धन तो मिथ्या कहलाता है धर्म जगत का सार है।
धन तो केवल भरम है जग का धर्म ही पालनहार है।।

(स्वरचित एवं मौलिक)
शीला द्विवेदी
उरई जालौन उत्तर प्रदेश