" मैडम जी ।यही है मेरी सत्तो।" रामदीन ने स्त्रियों के झुंठ में एक नवयुवती की तरफ इशारा कर कहा। फिर वह सत्तो के गले लग गया। सत्तो भी पिता के कंधे से लगकर रोने लगी।
" कहाॅ चली गयी थी। तुझे कहाँ कहाॅ नहीं ढूंढा। कैसी है तू।...."
फिर रामदीन बेतहाशा रोने लगा।
" पापा। शांत हो जाइये। मैं ठीक हूं। आप मुझे तलाश रहे थे। मुझे तो लगा कि... ।"
एक बार फिर से दोनों पिता पुत्री रोने लगे।
" तुझे ऐसा लगा। अरे। तुझे इन्हीं हाथों से पाल पोस कर बढा किया है। मैं खुद पर अविश्वास कर सकता हूं। पर तुझपर... ।नहीं नही। ऐसा बिल्कुल नहीं। "
काफी देर तक दोनों एक दूसरे का हालचाल पूछते रहे। इंस्पेक्टर राधा ने तब तक कोई दखल नहीं दी। जब दोनों शांत हो गये तब वह सत्तो को सभी से अलग ले गयी।
सत्तो लगभग चालीस मिनट बाद वापस आयी। ठाकुर साहब के परिवार के सभी सदस्यों पर एक एक मिनट भारी पड़ रहा था।भले ही सत्तो परिवार में अच्छी तरह बस गयी है। पर वास्तव में वह उसकी मजबूरी थी। एक सामान्य धारणा कि अपहृत लड़की को उसके घर बाले भी स्वीकार नहीं करते, इस तरह के अपराध का कारण बनती हैं। पर जब रामदीन जैसा पिता हो तो बेटी को भी बदलने में देर नहीं लगती। दामिनी और सुरुचि ने तो शुरुआत के समय सत्तो को मारा पीटा भी था।
फौलाद सिंह अलग विचार में बैठा था। भले ही उसने अपनी तरफ से पिछली भूल मान ली थी। सत्तो के कहे दोस्ती के नियमों को वह पूरा कर रहा था। पहले फौलाद सिंह ने सत्तो को पत्नी का दर्जा नहीं दिया था। पर सत्तो ने तो अभी तक उसे पति का दर्जा नहीं दिया है। आज भाग्य पूरी तरह सत्तो के पक्ष में है। संभव है कि उसे हवेली की जिंदगी पसंद ही न हो। संभव है कि उसके मन में पहले से कोई और है। अभी तक मजबूरी में वह सब निभा रही थी। समय का चक्र देखो। कल तक वह मजबूर थी। और आज हम। पुलिस इंस्पेक्टर भी बड़ी कड़क है। आज सत्तो फिर से अपना भाग्य बनायेगी। अपना भाग्य बनाने के चक्कर में कौन दूसरों की चिंता करता है।
इतने समय में ठाकुर भानुसिंह यह जान गये थे कि सत्तो उनका अहित नहीं चाहेगी। उन्होंने तो खुद सत्तो से उसके पिता के विषय में पूछा था। पर तब भी मन में बहुत थोड़ा सा अज्ञात डर तो था ही।
सत्तो वापस आयी। उसके साथ इंस्पेक्टर राधा और रामदीन भी थे। दोनों के चेहरे पर संतुष्टि के भाव थे।
" ठाकुर साहब। हमें माफ कीजिये। सत्तो ने हमें सब सच बता दिया है। भले ही आपने उसे खरीदा है। पर आप उसे आजाद कराना चाहते थे। आपने तो सत्तो को उसके घर भेजने की भी कोशिश की। पर सत्तो के मन में यही बात थी कि उसके घर बाले उसे स्वीकार नहीं करेंगें। सत्तो की शादी भी उसी की मर्जी से हुई है। तो अब आप सभी पर कोई मुकदमा तो नहीं बनता है। पर आपको एक दो बार अदालत में गवाही देने आना होगा। आप सभी जा सकते हैं। "
इंस्पेक्टर राधा सोच रही थी कि संसार में बुरे लोगों के साथ साथ कितने अच्छे लोग भी होते हैं। जहाँ इतनी लड़कियों के माता पिता ने पुलिस को सूचना भी नहीं दी, वहीं रामदीन ने बेटी की तलाश में दिन रात एक कर दी। अपनी नौकरी भी छोड़ दी। इधर भी इन ठाकुर साहब ने लड़की को बचाया और उसे अपने परिवार में सम्मान दिया। पर उन दोनों के अतिरिक्त सत्तो भी अच्छाई की जिस ऊचाई पर है, यह बहुत कम लोग जानते थे। ठाकुर भानुसिंह अभी तक तो सत्तो का आदर करते थे, पर अब उसकी मन ही मन पूजा भी करने लगे। ईश्वर ने उन्हें सब कुछ दिया था पर बेटी नहीं दी थी। आज उन्हें सत्तो के रूप में बेटी मिल गयी। बेटा भले ही कुल के वासिस होते हैं, पर परिवार का आखरी समय तक हित केवल बेटियां ही चाहती हैं।ठाकुर साहब की तंद्रा सत्तो की आवाज से टूटी।
" पापा। आप सही कहते थे। देखो मेरे पापा मुझे ढूंढते हुए आये हैं। मेने आपकी बात पर विश्वास नहीं किया था। इसीलिए इतनी परेशानी हुई। मुझे माफ कर दो।" सत्तो ठाकुर साहब के पैरों में झुकने लगी। ठाकुर साहब ने उसे उठाकर गले लगा लिया। सामने रामदीन हाथ जोड़ खड़े थे। ठाकुर साहब सत्तो से अलग होकर छोटे समधी के गले लग गये।
ठाकुर साहब का आयोजन कुछ समय के लिये रुका जरूर था। पर अब आयोजन आज ही होगा। अभी तक तो दो खुशियां मना रहे थे। अब एक खुशी और बढ गयी है। छोटी बहू को उसके पिता जी मिल गये हैं। आज पहली बार छोटे समधी आये हैं। सभी कामगारों को फोन कर बुलाया जा रहा है।
पर आज एक अन्य खुशी की बात भी है। आज फौलाद सिंह और सत्तो के प्रेम का पौधा बहुत बड़ा वृक्ष बनने की राह पर है। सत्तो अब चाहकर भी उससे नजरें फेर नहीं सकती है। अब उसके स्वप्नों में फौलाद सिंह नित्य हिस्सा बन रहे हैं। दोस्ती प्रेम का आरंभ कही जाती है और अंत भी। जब तक पति और पत्नी के मध्य शासक और अनुचर का भाव होता है, तब तक उनके मध्य वास्तविक प्रेम संभव नहीं है। प्रेम किसी को नीचे नहीं गिराता। प्रेम तो बस उठाता ही उठाता है। मानवता से आरंभ हुई कहानी मित्रता की राह पर चलते हुए प्रेम की कुंज गलियों में विहार की तैयारी कर रही है।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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