ऊँचाइयाँ छूने की इंसान दिन रात कोशिश करता,
शुरुआत कहाँ से की थी यही भूल जाता....।
आगे बढ़ना भी है जरूरी, जमीन से जुड़े रहना भी है जरूरी........।
गर आ गया मन में अहम,गिर जाओगे फिर टूटेगा वहम ।
ऊँचाइयाँ छूने का लगा हुआ है होड़,
कमजोर पर गयी है रिश्ते की डोर....।
हर एक घर में बूढ़ी आँखे है, बेबस और लाचार..।
छीन लिया इस ऊँचाई ने,उनके बच्चों के संस्कार.......।
ऋचा कर्ण😊✍

0 टिप्पणियाँ