बूढ़ी आंखों से पलकें बिछाए वो दिन रात अपने प्रियतम प्रभु का इंतजार करती।कब आओगे प्रभु, ये जन्म मेरा यूं ही व्यर्थ तो ना चला जाएगा,मन ही मन वह रोज़ यही दुहराती और पंथ बुहारती ,रास्ते में अगवानी में फूल बिछाती जाती।
ये प्रतीक्षा थी एक भक्त की,जिसके गुरु ने कहा था,तुम्हारी भक्ति से देखना एक दिन प्रभु स्वयं खिंचे चले आएंगे।
दुनिया ने जिसे ठुकराया ,उसे प्रभु ने गले लगाया ,ये सत्य है।
भील जाति में जन्मी शबरी ,जो बहुत ही कुरूप थी,उसे दिन के उजाले में कोई देखना नहीं चाहता था। छोटी उम्र में विवाह कर दिया गया,और रात के अंधेरे में उसकी विदाई भी।
रास्ते में पति ने उसका मुखड़ा क्या देखा ,वो तो नौ दो ग्यारह हो गया।नवविवाहिता पत्नी को घने जंगल में छोड़ वो भाग गया।अकेली कन्या ,वापस जा भी नहीं सकती थी किसी तरह भटकते मतंग ऋषि के आश्रम पहुंची ।
वहां भी तिरस्कार,फिर भी उसने हार नहीं मानी ,वो आश्रम वासियों के उठने से पहले उठ जाती ,रास्ते के कंकड़ बहारती,वहां बालू डालती,हवन के लिए लकड़ियां काट कर पहले से रख देती।
उसके सेवा भाव को देख ,ऋषि मतंग बहुत खुश हुए,और उन्होंने उसे आश्रम में जगह दी।
जब उनका अंतिम समय आया तो उन्होंने उसे आशीर्वाद दिया कि ,वो अपने इष्ट के दर्शन अवश्य करेगी।
उसके बाद से वर्षों बीत गए,शबरी बूढ़ी हो गई लेकिन वह रोजाना उसी उत्साह से प्रभु की बाट जोहती ।उनके पंथ पर फूल बिखेरती , कंद मूल तोड़ लाती ।
आखिर वो दिन आ भी गया,जिसका सपना उसकी जो बूढ़ी आंखे बरसों से देख रही थी,राम और लक्ष्मण उसकी कुटिया में पधारे।
भक्ति में अभिभूत की मेरे प्रभु को कोई बेर खट्टे ना लगे,खुद चख कर देखती और जूठे बेर प्रभु को खिलाती ।प्रेम के भूखे प्रभु उसे स्वीकार करते गए।शबरी की आंखों से आंसू झर झर बह रहे थे।
सब कुछ पा लिया था उसने,जिसे पाने के लिए जन्मों जन्म लेते होते हैं।
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समाप्त

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