हे पथिक तू लेकर चल 
मुझको ले चल अपने गांव मे 
हरियाली को नित्य निहारूं 
बैठ वृक्ष की छाँव मे

कोयल के मै गीत सुनू
और अपने भाग्य पर इतराऊं 
लहलहाते फसलों के मध्य  
मै मस्त रहूं और इठलाऊँ

हे पथिक तू लेकर चल 
मुझे ताल की नाव मे 
हरियाली को नित्य निहारूं 
बैठ वृक्ष की छाँव मे

सोंधी मिट्टी की खुशबू लूं मै 
अपने ललाट पर तिलक लगाऊँ 
धरती माँ को छूकर मै 
एक किसान पुत्र कहलाऊँ 
बैठ जाऊं मै फिर अपने बाबा के पाँव मे 
हे पथिक तू लेकर चल 
मुझको ले चल अपने गांव मे

अपनी अच्छी फसल उपजाऊँ  
लप्सी पूड़ी का भोग लगाऊँ 
फिर गांव के मंदिर मे जाकर 
पूजा करूँ और शीश नवाऊँ 
जाने का मन फिर न करे
 ऐसा बधुं मै लगाव मे 
हे पथिक तू लेकर चल 
मुझको ले चल अपने गांव मे
हरियाली को नित्य निहारूं 
बैठ वृक्ष की छावं मे 
आपका मुकेश लखनवी