किसी को क़दर नही अपनी, पर जिम्मेदारी ओढ़ कर बैठें हैं
जहाँ हर शख्स मतलबी है, उस मोड़ पर बैठे हैं
हर फ़र्ज़ निभाते हैं इबादत की तरह
दिल के सुकूंन की ख्वाहिश में सब छोड़ कर बैठे हैं
जहाँ हर शख्स मतलबी है, उस मोड़ पर बैठे हैं
रिश्तों में खुशियों को कुछ यूं तलाशा हमने
कि खुद से खुद का ही रिश्ता अब तोड़कर बैठे हैं
जहाँ हर शख्स मतलबी है, उस मोड़ पर बैठे हैं
किसी का साथ न हो पर तेरा सहारा पाकर
अपने मासूम दिल के टुकड़ों को रोज जोड़कर बैठे हैं
जहाँ हर शख्स मतलबी है, उस मोड़ पर बैठे हैं
✍️प्रीति ताम्रकार
जबलपुर

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