ये जो चाँदनी बिखरी है मेरे आंगन मे
ऐसा लगता तू खिल के मुस्कुराई है
होके बेचैन मैंने चाँद को देखा तो
उसमें सूरत तेरी ही नज़र आई है
जब कभी बारिशों की रिमझिम हो
मुझे लगता तू हर बूंद में समाई है
सौंधी मिट्टी सी जान यादें तेरी
दूर रहकर भी मेरी सांसों को महकाई है
कोई मीठी धुन सी तू लगती
जिसे ये ज़िंदगी मेरी गुनगुनाई है
जिसे सुनना चाहता हूँ हर पल मैं
तू वो शायरी है तू ही वो रुबाई है
अंधेरी रातों मे भी चिरागों की तरह
तेरी चाहत ने रोशनी बिखराई है
तन्हा होकर भी तन्हा न कभी होता मैं
तू संग रहती यूं जैसे मेरी परछाई है
✍️प्रीति ताम्रकार
जबलपुर

0 टिप्पणियाँ