आसमाँ में खूबसूरत वो टिमटिमाते तारे है,
आरजू करते पूरी खुद टूट कर हमारी है।
अमावस्या की रात्रि में चाँद जब अस्तित्व हीन हो,
आसमान को करते प्रकाशित तब सितारे है।
आँगन में बैठी इक विरहिन जब पिय का इंतजार करें,
आसमाँ से बतियाती है तो मुस्काते तारे है।
आकाश गंगा सुशोभित कहीं तो कहीं सप्तऋषि चमकते है,
अविरल रौशनी से है भरपूर वो चमकते हुए तारे है।
अद्भुद से उस दृश्य को देखकर मन हर्षाता है,
अलौकिक है वो दिव्य प्रकाश जो गगन को सजाता है।।
शीला द्विवेदी "अक्षरा"

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