दृढ़ निश्चय को बना लिया ,
उसने अपना अटूट हथियार।
जन्मी वह गरीब परिवार में,
परिस्थितियों से मानी न हार।

एक लड़की होकर भी वजन
ज्यादा लड़को से उठाती थी।
चेहरे पर दिखती शिकन नहीं,
सपनों से आंखें चमकती थीं।

पूरा करने हेतु सपनो को अपने,
चल पड़ी वह कठिन पथ पर।
मिलती है मंजिल केवल उसी को,
करता जो रहता निरंतर संघर्ष।

बात कर रही हूँ मैं किसकी,
पहेली ये बूझो तो मैं जानू।
हाँ सही पकड़ा है आपने,
ये हैं हमारी मीराबाई चानू।

रजत पदक दिलाकर ओलंपिक में,
देश का मान बहुत बढ़ाया है।
साकार हुआ स्वप्न इस ललना का,
चानू नाम पर चार चाँद लगाया है।
मेहनत का मीठा फल पाया है।

स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह'