एक तरफ भयंकर महामारी, 
मृतक शरीरों से पटी,ढकी ये धरती 
और  प्राण वायु की आश में बैठी या लेटी 
जिंदा लाशें है और 
वही उसी वक्त, उसी जगह मुनाफाखोरी,
जमाखोरी,कालाबाजारी और मानव अंग तस्करी
जैसे  घृणित तमाशें है l
सहसा मुझे यूँही बस याद हो आया 
महाभारत का एक प्रसंग, 
पूछ बैठे मानो यक्ष आज फिर
कहो युधिष्ठिर - किमाश्चर्यम?
 पर  लगा युधिष्ठिर दशा देख यह मानवता पर रोने चला
शोकाकुल चित्कारों और असंख्य साईकलों पर लदी 
खाक होने,कोख में सोने की जगह तकती, 
दर दर भटकती लाशों के बीच भी,
सब मनुजता छोड़ ,नैतिकता सिकोड़,
धन बटोरते, उत्सव विलासी मनुष्यों पर 
कर दृष्टिपात कहो ओ यक्ष! 
क्या इससे भी अधिक हो सकता है कुछ आश्चर्य भला?
               
                                                                       -  निगम झा