गुरु शब्द ही ऐसा
जिसमें सार्थकता है समाया
गुरु में 'गु' होता अंधकार का द्योतक
होता 'रू' प्रकाश के समान
चेतन स्वरुप दिव्य ज्योति की भाँति
जीवन प्रदीप बन आलोकित करते
अज्ञानता के अंधकार से
दीपशिखा बनकर हृदय को
प्रकाशित करते गुरु
असफलता को सफ़लता में बदलने का
हुनर हैं गुरु
डगमगाते कदम को थाम
ऊँची उड़ान भरने का हौसला
हैं गुरु
गुरु ही गलतियां सुधार
चक्रव्यूह भेदन सीखाते
अध्यात्म की मार्ग दिखाकर
हलाहल जीवन का पीकर
सन्मार्ग पर चलना सिखाते
गुरु कुम्हार शिष्य गिली मिट्टी समान
सच्चे गुरु वही होते, जो
दे कर सहारा अपने तेजस का
करते सुदृढ़ व्यक्तित्व का निर्माण
करते पल्लवित नव युगीन समाज का
मानवता का प्रकाश पुँज
पुष्पित करते ज्ञानोदय बनकर
परमेश्वर भी करते जिनका वंदन
उन गुरु को मेरा सादर नमन है
आरती झा(स्वरचित व मौलिक)
दिल्ली
सर्वाधिकार सुरक्षित©®

0 टिप्पणियाँ