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     रात के आगोश  में ,टिमटिमाता  सपना
     मुझको  लगे  प्यारा, प्यारा-सा ये अपना

     खो  जाऊं मैं , उस सुंदर  ख्वाबों में
     सच  को जी जाऊं ,उन अंधेरी  रातों में

     पर..... है तो यह ,ओझिल  होता  सपना
     हकीकत  में  ना जाने, क्या?? है ये मेरा अपना

     अंधेरी  रातों  को  चीरकर, जब हुआ उजियारा
     आंखों  के सामने ही था , वह सपना प्यारा

     गहरी  निशा में देखा जो , एक  प्यारा-सा सपना
     पाया  मैंने खुशहाली से भरा , यह जीवन  अपना

                                   
 मनीषा भुआर्य ठाकुर(कर्नाटक)