दौलत जरूरी है जीने के लिए ;
पर मेरे खुदा इतनी न देना...
की मेरे सिर चढ़ जाये..
मेरा अपना स्वरुप धूमिल कर जाये...
मेरे अपनों को मुझसे दूर  कर जाये...

          मैं इसके नशे में रहूँ...
          सिर्फ कटुता के ताने बुनू...
          मेरे अपनों को ही ओछा करूँ...

          मेरे खुदा.बस  इतनी ही दौलत देना...
          मुझसे मेरा स्वाभिमान न छीने....
          मुझसे मेरा असली रंग न छीने..

          इसके ही  रंग में ढल न जाऊँ...
          इसके ही तौर -तारीकों में खो न जाऊँ...
          इतनी दौलत कभी न देना...
          मेरा वजूद है किसलिए?
          यही भूल जाऊँ ~
          
          दौलत जरूरी है....
    पर मेरे कृष्णा इतनी न देना...
    अपनी द्वारिका को समुन्द्र तल में डूबा दूँ....
    स्वयं ही इसे रसातल पहुंचाऊं .....
    अपना विवेक खो दूँ..
    इतनी मगरूर हो जाऊं.....
   कि कलह का ही बीजारोपण करूँ...

     दौलत जरूरी है...
  पर  मेरे खुदा इतनी ही देना...
  कि मैं अपनी पहचान जिंदा रख पाऊँ...
  तुमने जिस काम के लिए धरा पर भेजा है
  उसके लिए साधन इकठ्ठा कर पाऊँ.....
  तुम्हारी खुशबू से अपने स्व को जगाऊं...

                         डॉ "पल्लवी "कुमारी"पाम "