कृष्णा को आज अपना घर पाकर बहुत खुशी हो रही थी एक छोटे से कमरे में ही उसने अपनी दुनिया बसाने की ठान ली कहां किस्मत ने उसके लिए सब दरवाजे बंद कर दिए थे।
और आज इतनी सुंदर जगह पर लाकर उसे खड़ा कर दिया एक पल में ही उसे सब लौटा दिया ।कृष्णा को लग रहा था क्या मैं सपना तो नहीं देख रहा क्या यह सब कुछ सच में हो रहा है उसने अपने आप को चुटकी काटी और महसूस किया कि नहीं यह सब कुछ सच है।
तभी घनश्याम जी के अन्य नौकर ने कृष्णा के लिए कुछ कपड़े दिए। कृष्णा ने कहा मालकिन की एक पुरानी साड़ी मिल जाए तो आपका भला होगा।
नौकर ने साहब से कहा तो उन्होंने साड़ी का इंतजाम करा दिया।
कृष्णा ने साड़ी से बच्चे के लिए झूला बनाया और उसमें बच्चे को लिटा दिया।
तभी घनश्याम जी का संदेश आया आज तुम आराम करो बहुत देर हो गई है अब कल सुबह बात करेंगे जिस चीज की भी जरूरत हो वह बता देना।
कृष्णा की आंखों में नींद कहां थी।रात उसकी आंखों में ही गुजर गई। सुबह जल्दी नहा धोकर वह तैयार हो गया और मोहन को भी तैयार कर लिया। तभी घनश्याम जी का बुलावा आ गया।
घनश्याम जी ने उसे अपने पास बंगले में अंदर बुलाया । रागिनी देखो ये तुम्हारा ध्यान रखेंगे । अपनी पत्नी से अवगत कराते हुए घनश्याम जी ने कहा।
घनश्याम जी के कोई औलाद नहीं है अभी कुछ दिनों पहले ही घनश्याम जी की पत्नी रागिनी गर्भवती हुई है । बहुत सालों बाद खुशी ने उनके यहां दस्तक दी थी। उसी की देखभाल के लिए वह कृष्णा को लाए हैं।
जिस से ऊपर की और घर के सारे कामों की जिम्मेदारी कृष्णा उठा सकें। उनकी पत्नी की देखभाल अच्छे से हो सके और उनकी पत्नी आराम कर सके।
कृष्णा ने रागिनी जी को नमस्ते किया।
रागिनी को कृष्णा को देखकर कोई भी खुशी नहीं हुई। लेकिन उस समय चुप रही।
कृष्णा के जाने के बाद उन्होंने अपनी पति घनश्याम से कहा कि कृष्णा को को वापस भेज दें।
श्याम जी ने कहा यह बहुत विश्वास पात्र है। इसको मैं इस तरह से नहीं भेज सकता। यह मेरे भरोसे पर ही कहां आया है। इस तरह से बीच भंवर में इसको नहीं छोड़ सकता।
रागिनी ने घनश्याम जी से कहां आपसे बेशक काम पर रख लो ।लेकिन कोशिश करना कि मेरे सामने ना आए क्योंकि मैं अपने बच्चा गोरा चिट्टा और स्वस्थ चाहती हूं। मैंने सुना है गर्भावस्था में जिस रंग रूप को देखो बच्चे पर इसका प्रभाव पड़ता है।
यह सब बातें कृष्णा सुन रहा था लेकिन कुछ नहीं बोला।घनश्याम जी बाहर आकर उसे सारे कार्य समझाने लगे।
कृष्णा ने घनश्याम जी से कहा। आप फ़िक्र मत करो मैं मालकिन के सामने नहीं जाऊंगा और पीछे ही उनके सारे काम वह जिम्मेदारी संभाल लूंगा।
नहीं-नहीं कृष्णा ऐसी कोई बात नहीं है बस ऐसी सुनी सुनाई बातों पर विश्वास करती है उस कारण उसने यह बात कही।
कोई बात नहीं साहब जी मेरी मालकिन की यही मर्जी है तो ऐसा ही होगा। उनके आराम के लिए ही तो आप मुझे लाए हैं।
ठीक है कृष्णा जैसी तुम्हारी मर्जी और घनश्याम जी कृष्णा को सारे काम अच्छे सी बताएं।
कृष्णा पर दो दो जिम्मेदारी आ गई। वह पूरे दिन घर में करने वाले सभी कार्य देखता सभी का दिन ध्यान रखता और बीच-बीच में मोहन को जाकर देखता था क्योंकि अभी बहुत छोटा था कभी भी रोने लगता था। उसे उसका मां-बाप दोनों बनना था।
मालकिन का क्या खाएंगी ?क्या दवा लेगी? इस बात का भी पूरा ध्यान रखता था । उनके प्रति बिल्कुल भी लापरवाही नहीं होने देता था। समय-समय पर साहब को भी डॉक्टरी जांच के लिए याद दिलाता था।
इसी प्रकार दिन पर दिन गुजरते जा रहे थे। कृष्णा और मोहन उस माहौल में ढल गए थे ।सबसे मिलजुल गए थे। मोहन सात महीने का हो गया था। अब वह घुटनों पर चलता था जिस कारण कृष्णा को उसे संभालने में और ध्यान देना पड़ता था।
अधिकतर तो उसे साड़ी से पेट पर बांध लेता था ।जिससे उसका ध्यान रखा जा सके ।और अपने कार्य में संकलन रहता था।
घनश्याम जी को किसी भी कार्य की जरूरत हो कृष्णा हमेशा हाजिर करता था ।चाहे उनके जूते पोलिश करने हो चाहे उनके चाय हो सब कुछ कृष्णा देखता था। मीटिंग में जाना हो तो की कृष्णा याद दिलाना था उनकी पूरी समय सूची कृष्णा को रटी रहती थी कुछ भी उन्हें भूलने नहीं देता था।
यहां तक की बहुत जरूरी पैसों का लेनदेन भी कृष्णा से ही कराते थे। जल्द ही कृष्णा ने सब कुछ संभाल लिया।
क्रमशः
नीलम गुप्ता

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