**********************************
ये ऊपरी अंधेरी कोठरी से कैसी कंहरने की आवाज आई है?
ये कैसी चिल्लाहट और रोने की चीख सुनाई है?
लगता आज अपनी छोटी बिटिया को मासिक धर्म है आई है?
मेरी बिटिया तुझे क्या क्या हो रहा है?
नहीं मांँ बस थोड़ा सा दर्द हो रहा है।
ऐसा क्या बात है जो तुझे शर्म आता है?
नही मांँ बस अब समाज की सोच पे बस हमे रोना आ जाता है।
जैसे लगता मासिक धर्म होना पिछले जन्म का बुरा कर्म होना नजर आ जाता है।
नही मेरी प्यारी मुन्नी हमे तो लोगो के मानसिकता पे बस गुस्सा ही आ जाता है।
जिस खून को वो गंदा है कहते उसी खून के इकट्ठा होने पे आज मर्द बन जाता है।
माँ ये पांँच दिन के किसी अभिशाप से लगते है
कभी लोग आचार मत छुओ तो कभी लोग मंदिर ना जाओ ना जाने क्यू हमे पाप सा समझते है।
हम भी किसी कोने में रोते ही रहते है।
ये मुश्किल दिन हम किसी से ना कहते है।
नही बेटा ये तो प्राकृतिक देन है
इसका कोई छुआ छूत से ना कोई लेन देन है।
बेटा मासिक धर्म आए तो शर्म मत करना
मासिक धर्म के दौरान स्वच्छ सेनेटरी पैड प्रयोग करना।
मांँ हमें ही क्यों हर महीने मरना होता है?
मरते हम हर महीने फिर भी हमे प्रतिनिधित्व भी हर जगह करना होता है।
हम देवी माने जाते हैं फिर एक देवी को मंदिर में जाने से तिरस्कार होना पड़ता है
मन के पावन माने जाते फिर भी हमे हरदम स्वच्छ होना पड़ता है।
मांँ यह मासिक धर्म अभिशाप लगता है।
*************************************
राजेश "बनारसी बाबू"
उत्तर प्रदेश वाराणसी

1 टिप्पणियाँ
"मासिक धर्म" को अपने पत्रिका में स्थान देने के लिए