आज डाक्टर नामदेव अपने दोस्त सुदर्शन के घर के लिये निकले तो दोस्त के हैसियत से नहीं, बल्कि समधी की हैसियत से निकले। लक्ष्मी को वह उसके बचपन से देखते आये थै। आज लक्ष्मी की गोदभराई करके उसे अपनी बहू बनाने को निकल रहे थे। विशाल वापस अपने कालेज चला गया था। विशाल का दोस्त संकल्प डाक्टर साहब की मदद कर रहा था।
संकल्प डाक्टर साहब के ड्राइवर विजय का पुत्र, पर उसे कभी भी नौकर का बेटा नहीं समझा गया। उसकी पढाई का खर्च खुद डाक्टर साहब कर रहे हैं। वह उसी कालेज का छात्र है जिसमें लक्ष्मी अध्ययन करती हैं। पढाई के अतिरिक्त एक्स्ट्रा एक्टिविटी में भी बहुत होशियार है। कविताएं लिखना उसका शौक है। प्रेमगीत लिखने में तो उसका जबाब नहीं। अभी एक अच्छे प्रकाशक ने संकल्प के प्रेम गीतों का संग्रह भी प्रकाशित किया है। एक निम्न वर्गीय परिवार के लड़के के बहुत ऊचे सपने नहीं हैं। वह अध्यापन करके अपना जीवन व्यतीत करना चाहता है। उसी हिसाब से वह तैयारी कर रहा है।
पर यह कहना पूर्ण सत्य भी नहीं है कि संकल्प बड़े बड़े सपने नहीं देखता है। सपनों पर भला किसका वश है। कभी कोई किसी के मन को भा जाता है। तो वही उसके सपनों का हिस्सा बन जाता है। आजकल संकल्प के सपनों में एक बहुत धनी परिवार की लड़की आ रही है।संकल्प जितना उससे दूर होता है, उतना ही वह उसे तड़पाती है। मानों कहती हो कि मुझसे कब तक भागोगें। एक न एक दिन तो खुद मेरे ही घर चलकर आओंगे। संकल्प को पता ही नहीं है कि वह दिन आज ही है। जिस लड़की के ख्यालों में वह खोया रहता है, वह लड़की उसके अभिन्न मित्र की पत्नी बनने जा रही है। आज वह अंकल और अंटी के साथ अपने मित्र का रिश्ता उसी लड़की से पक्का करने जा रहा है।
गाड़ी की डिक्की भेंट के कपड़ों से भर गयी। गाड़ी की छत पर भी संकल्प ने फलों और मेवों की टोकरी बांध ली। फिर डाक्टर साहब को आवाज लगायी।
" अंकल जी। सब कुछ रैडी है। आ जाइये।"
डाक्टर नामदेव अपनी पत्नी सुनीता के साथ घर से बाहर निकले। फिर थोड़ी देर अपने खास नौकर रामू को कुछ हिदायतें दीं। जैसे कि हो सकता है कि आने में देर हो जाये। तो घर का ताला लगा लेना। जब फोन करूं तब खोलना।
सुनीता जी का उत्साह आज देखते ही बन रहा था। आखिर अपने इकलौते बेटे का रिश्ता जो तय करने जा रही थीं। आज के समय में किसी पर बहुत भरोसा नहीं किया जा सकता है। अनजान परिवारों के विषय में कभी भी ज्यादा पता नहीं कर सकते। फिर लक्ष्मी तो संस्कारों की धनी लड़की है। लक्ष्मी को बहू से अधिक बेटी बनाने के सपने सुनीता जी के मन में कब से चल रहे थे। अनेकों बार अपने पति को उन्होंने बोला भी था। आज उनके मन की बात पूरी होने का एक चरण पूर्ण होने बाला था। वैसे शादी की कोई जल्दी नहीं है। बस लक्ष्मी की गोद भर आयें। फिर जब उचित समय होगा तब शादी भी कर दी जायेगी।
संकल्प भी आज बहुत खुश था। आज उसने अपने पिता को मना कर दिया था। आज ड्राइवर का काम वही करेगा। इस बहाने वह अपनी होने बाली भाभी को भी देख लेगा। आखिर उसे भी तो पता चलना चाहिये कि जिस लड़की के गुण गाते अंकल और अंटी जी थकते नहीं है, जो लड़की उनके दोस्त के सपनों में बसी है, आखिर वह है कैसी।
शहर में सुबह से ही जाम लगा था। गाड़ी धीरे धीरे लक्ष्मी के घर की तरफ बढती रही। आधे घंटे का सफर एक घंटे से भी अधिक समय में तय हुआ।
संकल्प को भाभी से मिलने की जितनी जल्दी थी, उतनी ही देर होती जा रही थी। आखिर गाड़ी वकील साहब के घर पहुंची। सुदर्शन और सुलक्षणा घर के बाहर ही उनका इंतजार कर रहे थे। आज सुदर्शन और नामदेव जी गले लग गये। आज उन्हें गले लगने में अलग ही अहसास हो रहा है।
सुनीता जी सुलक्षणा जी के साथ घर के भीतर चली गयी। एक कमरे में सारी तैयारी कर रखी थी। वहीं लक्ष्मी तैयार होकर बेठी थी। महरून लाल रंग की साड़ी में बहुत सी सुंदर लग रही थी। लक्ष्मी ने उठकर सुनीता जी के पैर छुए तो सुनीता जी ने उसे उठाकर गले से लगा लिया।
तभी संकल्प भी फलों की टोकरी लेकर भीतर आ गया। संकल्प की निगाहें लक्ष्मी की निगाहों से मिलीं। अभी तक दोस्त की सगाई का जो उत्साह था, एकदम ठंडा पड़ गया।
संकल्प कई बार कपड़े तथा और भी उपहार लेकर उस कमरे में गया। पर अब वह लक्ष्मी से नजर चुरा रहा था। दूसरी तरफ लक्ष्मी भी संकल्प को देखकर अनदेखा कर रही थी। ईश्वर भी कभी कभी कितनी परीक्षा लेते हैं। जो नवयुवक लक्ष्मी के सपनों का हिस्सा है, जिससे सपनों में उसने अनेकों बार प्रेम की बातें की हैं, आज जब वह जीवन को अपने माता पिता की खुशी से जीने की राह पर बढ रही है तो उस राह में भी उसका वही प्रेमी बैठा हुआ है। भले ही उसे यह पता नहीं कि संकल्प का विशाल से क्या रिश्ता है, पर इतना तो निश्चित है कि इस मार्ग में भी उसकी नजरें बार बार अपने स्वप्न मीत से टकरायेंगी। फिर वह किस तरह अपना वैवाहिक जीवन जी पायेगी।
पर एक सत्य यह भी है कि लक्ष्मी ऐसा इसलिये कर पायेगी क्योंकि वह एक स्त्री है। स्त्रियां प्रेम के लिये खुद को तथा कर्तव्य के लिये अपने प्रेम को भी कुर्बान करना जानती हैं। मुख्य समस्या तो संकल्प की लगती है। जिस लड़की को बहुत अधिक धनी समझकर उसने अपने दिल की बात नहीं कही थी, वही लड़की उसके अभिन्न मित्र की पत्नी बनने जा रही है। उसका मन हो रहा है कि कहीं बहुत दूर भाग जाये। जहाँ उसे लक्ष्मी की परछाई भी न दिखे। पर ऐसा वह कर नहीं सकता। उसके घर में उसके पिता, माता और छोटी बहन है। वह उन सभी की आशा का केंद्र है। फिर लक्ष्मी तो उसके मित्र का स्वप्न है। उसके मित्र ने उसके लिये क्या क्या नहीं किया। कभी भी उसे नौकर का पुत्र नहीं माना। वह अपने मित्र के लिये अपने सपने की कुर्बानी दे देगा। अपने सामने वह लक्ष्मी को विशाल की बनते देखेगा पर आंखों से आंसू की एक बूंद भी नहीं गिरायेगा।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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