छिति, जल, नभ के तुम हो स्वामी।
सबसे अलग रहे तुम्हारी कहानी।।

पर्वत बीच सदा वास तुम्हारा।
सब तुमको कहें डमरू वाला।।

नाम संग तुम मन के भी भोले।
इस देवभूमि में तुम ही थे डोले।।

तुमसे ही निर्मल गंगा पानी।
सबसे अलग तुम्हारी कहानी।।

वर देने में तुम भेद न करते।
सुर, असुरों की पीड़ा हरते।।

भेद न तुमसे किसी ने पाया।
तीनो लोक में तुम्हारी माया।।

गिरि कण कण के तुम हो स्वामी।
सबसे अलग रहे तुम्हारी कहानी।।

सावन मास तुम्हारा ही आवे।
सबको खुशियों से भर जावे।।

श्रावण सोमवार तुमको ध्याये।
जीवन में वह सब सुख पाए।।

सदा घट घट के तुम अंतर्यामी।
सबसे अलग तुम्हारी कहानी।।


नाम - विक्रांत राजपूत चम्बली
पता - ग्वालियर (मध्य प्रदेश)