खो गए हम जाने कहाँ,
ढूढते है खुदको यहाँ वहाँ।

खो गयी वो तबसुम जाने कहाँ,
खो गए वो मासूम दिल के कारवाँ।

हर तरफ देखी जो फरेबी दुनियां,
थोड़े से हम भी हो गए फरेबी जां।

खो गयी वो तबसुम जाने कहाँ,
खो गए वो मासूम दिल के कारवाँ।

खो गए  वो एहसासों के लम्स,
खो गए वो लरजते जज्बों के बयां।

बढ़ गयीं इस दर्जा मसरूफियत,
खुद से ही खुद का पूछ बैठे पता।

पर कहीं भी वो पहले से दिन नही मिलते,
न मिलते उन बे फिक्र रातों के निशां।

अब दौर खो गया वो मासूमियत बाला,
कहीं न मिला ढूढ आए सारा जमी आशमा।

जब भी याद करने बैठे वो खोए लम्हें,
जाने क्यों  भीगती पलकें साथ देती न जुवां।

  पाने के नाम पर याद है बस नाम तेरा,
खोने के नाम पर खोया हुआ हर चाहत का लम्हां।

  अक्सर बहुत खोया हुआ सब लौट आता पास मेरे ,जब
रातें होती हैं अकेली, जैसे होता आशमा का चाँद तन्हां।

लोग कहते क्यों खोए रहते क्यों न कहते दिल की दास्ताँ,
दिल के बोझ किए हल्के किया जिक्र तो वो होंगे रुशवा।

खो गयीं वो बहारें, खो गए वो नजारे,
रह गया यादों में सिमटकर यादों का वो बागवां।

अन्जू दीक्षित,
उत्तर प्रदेश।