"""""""""""""""""""
इस धरा को संकटों से,आज तू उबार दे !
जय मां शारदे !, जय मां शारदे ! ......
नाम पर विकास के,
विनाश कर रहा है आदमी !
जला भविष्य को वर्तमान में ,
प्रकाश कर रहा है आदमी !
खोल ज्ञान चक्षुओं को ,
हर ले तम अज्ञान का !
आज प्यासा हो गया है,
मानव! मानव के प्राण का !
हो प्रकृति में संतुलन,
धरा को अभयदान दे !
जय मां शारदे !, जय मां शारदे !.......
न ईर्ष्या-द्वेष, लोभ-मोह,
न हिंसा के मन में भाव हों !
स्वप्न हो गगन के फिर भी ,
धरा पर टीके पांव हों !
बिछे हों नेक पथ पर ,
चाहे हजारों शूल !
घबराकर हो न जाए ,
हमसे कोई भूल !
मन को दृढ़ निश्चयओं का,
बहुमूल्य यह वरदान दे !
जय मां शारदे !, जय मां शारदे !........
पिंकी मिश्रा
भागलपुर बिहार

0 टिप्पणियाँ