कहते हैं ग्रहों की चाल टेढ़ी हो तो हमारे जीवन पर इसका प्रभाव दिखता है ।अरबों खरबों मील दूर स्थित ये ग्रह अपनी कक्षा में अनवरत घूमते रहते है,अगर ये भूल कर अपना रास्ता बदल दें तो ब्रह्मांड का संतुलन बिगड़ जाए  संभव है विनाश हो जाए।
ज्यादातर हमारे जीवन पर शनि का दुष्प्रभाव प्रभावी रूप से देखने को मिलता है।कहते हैं शनि को न्याय के लिए नियुक्त किया गया है ,इनकी वक्र दृष्टि से शायद ही कोई बचा हो ,ये छोटे छोटे मासूम बच्चे जो पृथ्वी पर  अपना नया जन्म लेते हैं उन्हें भी नही छोड़ते थे।

इसी से जुड़ी एक पौराणिक कथा है

दधीचि ऋषि के बारे में तो सब जानते हैं ,जिन्होंने जन कल्याण के लिए लिए अपनी अस्थियां प्रदान कर दी।
लेकिन उसके बाद क्या हुआ?
कहते हैं , उस समय जब दधीचि ऋषि की पत्नी गर्भवती थीं।

पति की मृत्यु का समाचार सुन उन्होंने उदरविदारण कर अपना गर्भ निकाला,एक मासूम बच्चा ,जिसका कोई दोष नहीं था  उसे प्रकृति के हवाले  कर (पीपल के वृक्ष के नीचे)सती हो गई।
उस बालक की रक्षा पशु,पक्षियों ने की,ज्ञान दिया ,बालक पीपल के  फल का सेवन कर जीवित रह पाया।

एक बार नारद ऋषि भ्रमण करते वहां से गुजरे उनकी दृष्टि उस बालक पर पड़ी ,तब उन्होंने उससे उसका परिचय पूछा।
उसने अपने बारे में कुछ भी नहीं पता होने की बात बताई।
तब नारद ऋषि ने ध्यान से उसके भूत के बारे में देखा और उसका परिचय बताया।
उसे बहुत सारा ज्ञान ,और विद्याएं सिखाई।
नाम रखा ,पिप्पलाद।पीपल के फल को खा कर जीवित रहने वाला।

पिप्पलाद अत्यंत तेजस्वी था ,उसने अपने बाल्यकाल में अनाथ होने का कारण जब  उसने नारद जी से पूछा ,तो उन्होंने इसका कारक  नारद ने शनि देव को बताया।

नारद के जाने के बाद बालक पिप्पलाद ने नारद जी के बताए अनुसार ब्रह्मा जी की घोर तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया।

ब्रह्मा जी ने प्रसन्न हो , वर मांगने को कहा तो पिप्पलाद ने अपनी दृष्टि मात्र से किसी चीज को जलाने की शक्ति मांगी।ब्रह्मा जी से वर मिलने के बाद सर्वप्रथम पिप्पलाद ने शनि देव का आह्वान कर अपने सम्मुख प्रस्तुत किया ,सामने पर उसने आंख खोलकर शनि देव को भस्म करना शुरू किया ,शनि सशरीर जलने लगे ।


ब्रह्मांड में कोलाहल मच गया।सारे देव पिप्पलाद से शनि देव को छोड़ने हेतु प्रार्थना करने लगे।पिप्पलाद ने सबकी विनती अस्वीकार कर दी।अंततः ब्रह्मा जी पधारे और शनिदेव को छोड़ने को कहा ,उसे बहुत समझाया कि ,तुम्हारे पिता ने स्वेच्छा से अपने शरीर का दान जन कल्याण के लिए किया था उनके इस दान को छोटा न करो ।व्यक्ति को उसके कर्म फल के अनुसार गति मिलती है ।इससे देव,दानव,मनुज कोई भी अछूता नहीं।


ब्रह्मा जी ने उसे छोड़ने के बदले और दो वरदान मांगने को कहा।
तब पिप्पलाद ने दो वरदान मांगे_
_जन्म से 5 वर्ष(कहीं कहीं 12,15)के किसी भी बालक की कुंडली में शनि दोष नहीं होगा।
_मुझ अनाथ को शरण पीपल ने दी है, अतः जो भी व्यक्ति सूर्योदय के पूर्व पीपल वृक्ष पर जल चढ़ाएगा ,उसपर शनि की महादशा का कोई असर नहीं होगा।

ब्रह्मा जी ने तथास्तु कह वरदान दिया ।तब पिप्पलाद ने जलते हुए शनि को अपने ब्रह्मदंड से उनके पैर पर आघात कर मुक्त कर दिया।जिससे शनिदेव के पैर क्षतिग्रस्त हो गए,और उनकी चाल धीमी हो गई।
तभी से शनि"शनै शनै चरति यः शनिश्चरः"
अर्थात जो धीरे धीरे चलता है वही शनिश्चर है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अगर वृहस्पति ग्रह को सौरमंडल का वैक्यूम क्लीनर कहते हैं ,अगर यह भूल जाए ,अपना काम न करे,तो शायद बड़े बड़े उल्कापिंड पृथ्वी पर गिर सर्वनाश कर दें। वृहस्पति के शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण के कारण वह सौरमंडल में आने वाली बाहरी उल्कापिंडों को अपनी ओर खींच लेता है।