पहला-पहला एहसास था,
कुछ नयापन घुला जीवन में।
इक अंकुर फूटा अंतस में,
सब कुछ बदल गया पलभर में।
इक नन्हा सा जीव गर्भ में,
माँ शब्द आल्हादित करता तन-मन को।
एक नाल जुड़ी दोनो में,
भावों का संवेग जुड़ा था।
कितना प्रेम सुधा रस संप्रेषण,
भाव-विचारों का आदान प्रदान।
पिता के आंखो की चमक निराली,
भावनाओं की उमड़ी बदरा सी।
बरस रहे आंखो से अश्रु,
खुशी पिता की तब झलकी।
नाम खोजते नित नये से,
नित नये ख्वाब भविष्य के भरते।
कभी गर्भ में करवट लेता,
नन्हे नन्हे पैर मारता।
कभी घूमता,कभी उचकता।
अपने होने का एहसास कराता।
अद्भुत पल तब आया जीवन में,
नन्हा कोमल प्यारा शिशु ,
रूदन स्वर गूँजा कानों में।
उस रूदन ने हर ली पीड़ा थी,
गोद में शिशु सुखद अनुभूति पल।
आंखो से आंखे मिल चमक उठी थी,
माता-पिता की अद्भुत गति थी।
कितना कोमल नन्हा सा रूप,
कोमल नन्हीअंगुलियों ने पकड़ी उँगली मेरी।
पिता ने बाहों में भरकर,
माथा चूमा था।
एक सुखद एहसास हुआ था ,
उस पल स्वयं को भूल सपने संजोए हर पल बेटे के।।
एक अमूल्य एहसास जीवन का।।
-------अनिता शर्मा झाँसी
-------मौलिक रचना

0 टिप्पणियाँ