असम की रहने वाली थी इरादों की पक्की थी,
देशभक्ति का जज्बा रखती वो इक सच्ची देशभक्त थी।
2 अक्टूबर 1997 में जन्मी अर्जुन पुरस्कार भी पाया है,
मुक्केबाजी को उसने अपना शौक बनाया है।
2019 में एक कांस्य पदक को जीत था,
मुक्केबाजी टूर्नामेंट में स्वर्ण पदक भी पाया था।
किस तरह देश का नाम रोशन करूँ
 कैसे अपनी पहिचान बनाऊं,
हर वक्त सोचती रहती थी 
मैं कैसे कुछ कर दिखलाऊँ।
मुक्केबाजी करती थी पर।मन को शांति न मिलती थी,
आसमाँ की ऊंचाईयां छूने को हर दम लालायित रहती थी।
देखी तस्वीर मुहब्बत की तो मन कई सवाल किए,
अर्श से लेकर फर्श सहित फिर पिता पूरी कहानी बयां किये।
इस एक कहानी ने बदली पूरी किस्मत लबलिना की,
चल पड़ी संघर्ष पथ पर और फिर जीत नित नई हासिल की।
दिख गयी पथ सिख गयी हम सबको भी वो पढ़ गयी,
कैसे करते सपने पूरे ये लबलिना भी बता गयी।

शीला द्विवेदी "अक्षरा"