चंपकपुरी से बहुत दूर तत्कालीन भारत ही नहीं अपितु पूरे विश्व के सबसे शक्तिशाली राज्य हस्तिनापुर में बहुत चहल पहल थी। इसी हस्तिनापुर की राजसत्ता पूरे विश्व के लिये अनिवार्य विषय बनी थी। महाराज धृतराष्ट्र के पुत्र कौरवों और महाराज पांडु के पुत्रों पांडवों के मध्य बहुत ही विनायक महाभारत का युद्ध हुआ था। इस युद्ध में अधिकांश विश्व के सभी राजाओं ने किसी एक पक्ष का साथ दिया था। धर्म और अधर्म के प्रतीक महाभारत के युद्ध में पांडवों की जीत इसीलिये संभव हुई क्योंकि वह धर्म की राह पर थे तथा भगवान श्री कृष्ण का उन्हें समर्थन था।
महाराज युधिष्ठिर ने अनेकों बार अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन किया था। अब फिर से अश्वमेघ यज्ञ कर रहे थे। उसी के आयोजन में हस्तिनापुर में उत्सव जैसा माहौल था। महाराज युधिष्ठिर के मित्र राजा पहले ही यज्ञ में उपस्थित थे। द्वारिका से भगवान श्री कृष्ण सात्यकि और अपने पुत्र प्रद्युम्न के साथ आये थे।
कृष्ण कर्ण अश्व की आराधना की जा रही थी। यज्ञज ब्राह्मणों द्वारा वेद मंत्रों का पाठ किया जा रहा था। महाराज युधिष्ठिर मुख्य यजमान के रूप में विराजित थे।
यज्ञ की दिव्य शक्तियों से शक्तिमान कृष्ण कर्ण अश्व पूरे संसार में अपनी इच्छानुसार विचरण करेगा। जो भी अश्व को बांधेगा उसे अश्व रक्षक परम धनुर्धर और भगवान श्री कृष्ण के सखा अर्जुन से युद्ध करना होगा।
इस तरह जब अश्व भूमंडल पर महाराज युधिष्ठिर का अधिकार कराकर जब वापस आयेगा तब इसी यज्ञ अग्नि में खुद की आहुति देगा। यही यज्ञ का विधान था।
एक विशाल सेना के साथ अर्जुन अश्व की रक्षा के लिये चलने को उद्यत थे। सहदेव भी साथ में थे। ठीक उसी क्षण द्वारिकाधीश को कुछ उपहास सूझा।
" अब बहुत समय हो गया पार्थ। आपने मुझसे कोई सहायता नहीं मांगी। कभी खांडववन के दाह के समय भी मैं तुम्हारे साथ था। महाभारत के रण में भी हम साथ साथ थे। पर अब लगता है कि पार्थ को एकाकी युद्ध जीतना आ गया है।"
"सच बात स्वीकार करनी होती है।" अर्जुन ने उत्तर दिया।" मधुसूदन। उस समय धरती महान वीरों से भरी हुई थी। पितामह भीष्म और गुरु द्रोण को भला कौन जीत सकता था। जिस कर्ण को मैं इतना तुच्छ समझता था, उसे हराना भी कितना कठिन सिद्ध हुआ। अश्वत्थामा द्वारा छोड़े नारायणास्त्र से भी भला हमें कौन बचा सकता था। चीन के राजा भगदत्त को भी आपसी सलाह के बिना कैसे जीत सकते थे। यह सत्य है कि पूरे महाभारत के रण में आपने युद्ध नहीं किया। पर यह भी सत्य है कि महाभारत का युद्ध आपके बिना जीता भी नहीं जा सकता था। अब उस तरह के योद्धा कहाॅ हैं। "
" हाॅ लगता तो यही है। पर संभव है कि अभी भी विश्व में कहीं ऐसे योद्धा हों जिन्हें तुम मेरी सहायता के बिना जीत न सको। "
द्वारिकाधीश की मुस्कान के पीछे कुछ तो रहस्य था। इस बार श्री कृष्ण के कहने से अर्जुन ने अपने साथ सात्यकि और प्रद्युम्न को भी ले लिया।
अश्व दिग्विजय के लिये चलने को उद्यत था। विप्रो का मंत्रोच्चारण तेज होने लगा। उसी समय भगवान श्री कृष्ण अश्व की पीठ सहला रहे थे। बहुत धीरे धीरे बोल रहे थे।
" महान यज्ञ अश्व। इस बार अर्जुन को दिखा ही देना कि अभी भी धरा पर ऐसे वीर हैं जिन्हें वह मेरी सहायता के बिना जीत नहीं सकता। महान अश्व। इन बातों को बहुत स्पष्टता से क्या कहूं। यज्ञ के मंत्रों से आपमें वह शक्ति आ ही चुकी है कि आप वीरों को गंध से भी पहचान लो। प्रत्येक यज्ञ का लक्ष्य मैं हूं। और आपका मन मेरी ही इच्छा का अनुवर्ती हो। "
महाराज युधिष्ठिर ने राज्य गृहण के बाद अनेकों बार अश्वमेघ यज्ञ किया था। पर इस बार अश्व जिस दिशा में बढा, उस तरफ पहले कोई भी अश्व नहीं गया था। अर्जुन को अनेकों स्थानों पर कठिनाई आयी। मन में एक वीरोचित प्रसन्नता भी हुई। यह गलत सिद्ध हो रहा है कि अब धरा पर वीर नहीं है। पर यज्ञ अश्व का ध्येय कुछ अलग ही था। चंपकपुरी की सीमा में घुसते ही अश्व इतनी तेजी से भागा कि कोई भी उसे देख न सका। अश्व का कहीं पता नहीं था। अर्जुन चिंतित होकर अश्व को तलाश रहे थे।
दूसरी तरफ वह अश्व महाराज हंसध्वज के दरवार में खड़ा था। मानों वह खुद ही कह रहा हो।
". अरे चंपकपुरी के वीरों। आप ही तो हों जिनके विषय में मुझसे भगवान श्रीकृष्ण ने कहा था। आप ही तो हों जिन्हें अर्जुन जीत नहीं सकता है। पूरे विश्व में एकपत्नी व्रत के अनुयायी वीरों। इस महान व्रत के कारण आप ही तो वह अद्वितीय शक्ति रखते हों कि आपको को कोई जीत नहीं सकता है। आप धरा पर इस अनोखे व्रत के कारण अजेय हों। आप सभी भगवान श्री कृष्ण के भक्त हों। मुझे पकड़कर अर्जुन को और संसार को दिखा दीजिये कि भक्त में और एकपत्नी ब्रती में कितनी शक्ति होती है। "
अर्जुन और उनकी सेना अश्व का पता लगा नही पा रहे थे। उन्हें अनुमान भी न था कि इस छोटे से राज्य में कोई यज्ञ अश्व को पकड़ सकता है। तभी एक दूत महाराज हंसध्वज का संदेश पत्र लेकर पहुंच गया। अर्जुन ने वह पत्र पढा।
" हस्तिनापुर नरेश परम धर्मात्मा महाराज युधिष्ठिर की जय हो। महाराज युधिष्ठिर के अनुज और भगवान श्री कृष्ण के सखा आपको भी मेरा प्रणाम। आपका यज्ञ अश्व हमारे पास आ गया है। हम चंपकपुरी वासी भगवान श्री कृष्ण के अनन्य अनुयायी हैं। एक बार भगवान द्वारिकाधीश का दर्शन चाहते हैं। इसलिये आपसे अनुरोध है कि अपने सखा को चंपकपुरी बुला लें। भगवान श्री कृष्ण की पूजा कर हम यज्ञ अश्व उन्हें सोप देंगें। "
यह तो अद्भुत शर्त थी। इस तरह द्वारिकाधीश को बुलाना कहाॅ तक सही रहेगा। अर्जुन ने पत्र का उत्तर भिजबाया।
" चंपकपुरी के नरेश महाराज हंसध्वज को महाराज युधिष्ठिर के छोटे भाई का प्रणाम। आपकी भक्ति का मैं सम्मान करता हूं। यज्ञ के उपरांत मैं खुद भगवान द्वारिकाधीश को लेकर आपके राज्य में आऊंगा। पर अभी यह संभव नहीं है। आप हमारा यज्ञ अश्व हमें वापस कर दें। अन्यथा नियमानुसार हमें आपसे युद्ध करना होगा। आप तो जानते ही हैं कि इस समय धरा पर मेरे समान कोई धनुर्धर नहीं है। मेने अनेकों बड़े बड़े योद्धाओं को युद्ध में हराया है। "
महाराज हंसध्वज ने इस पत्र का उत्तर भेज दिया।
" परमवीर। हमें आपकी वीरता में कोई संदेह नहीं है। पर यज्ञ अश्व हम आपको वापस नहीं करेंगे। यज्ञ अश्व हम अपने आराध्य को ही वापस देंगें। आप निश्चित ही विश्व में सबसे बड़े धनुर्धर हैं। पर हमारा विश्वास है कि भगवान श्री कृष्ण हमेशा अपने भक्तों के प्रण की लाज रखते हैं। उन्हीं अपने आराध्य के बलबूते मैं यह कह रहा हूं कि युद्ध में हमें हराकर तो आप अश्व नहीं ले जा पायेंगे। कल सूर्योदय के समय ही आपसे युद्ध भूमि में अपनी सेना के साथ मिलूंगा। "
इतना तो विश्वास करना ही होगा कि इस बार अर्जुन को कुछ अलग अनुभव होने बाला है। इतना तो मानना ही होगा कि भगवान हमेशा अपने भक्त के प्रण की रक्षा करते हैं। भले ही अर्जुन विश्व में सबसे बड़े धनुर्धर हों, फिर भी इतना तो मानना ही होगा कि वह चंपकपुरी के वीरों को तो जीतकर अश्व नहीं ले जा पायेंगे।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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