यदि ज्ञानियों की तुलना प्रकृति में किसी से की जा सकती है तो वह सागर है। अथाह जल स्रोत में सागर अनेकों दुर्लभ रत्नों को समेटे रहता है। उन रत्नों की तुलना विभिन्न ज्ञान से की जा सकती है। अक्सर चांद की रोशनी में सागर उफनने लगता है। फिर अनेकों रत्नों को बाहर छोड़ देता है।
पर सागर का यह सोचना कि उसमें केवल रत्न ही हैं, सर्वथा गलत है। सागर जैसे दुर्लभ रत्नों का घर है, उसी तरह गरल का भंडार भी। सागर का भावावेश में आने का अर्थ कभी भी नहीं है कि वह तट पर दुर्लभ रत्न छोड़ कर जायेगा। अनेकों बार सागर को भी अफसोस होता होगा कि उसका उफान वास्तव में संसार के काम नहीं आया।
सागर जितनी तेजी से उफनता है, उतनी ही तेजी से अपने को समेट भी लेता है। यह भी एक समझदार की निशानी है। खुद के कर्मों की समीक्षा करना भी आवश्यक है। अन्यथा तो अधिकांश लोग घमंड में इतने चूर होते हैं कि अपनी भूल भी स्वीकार नहीं करते। झूठ को सच सिद्ध करने लगते हैं।
अनेकों को लग सकता है कि मुनि शंख और लिखित का कृत्य अत्यंत ही निंदनीय था। वह तो खुद ज्ञानी थे। उन्हें सत्य पता होना चाहिये था। सुधन्वा की भक्ति पर उन्होंने संदेह किया।
पर मुझे लगता है कि वास्तव में समाज में किसी न किसी को संदेह करने बाला होना चाहिये। अनेकों बार झूठ सत्य के रूप में इस तरह लिपटा रहता है कि उस झूठ को अनेकों वर्षों तक लोग सत्य समझते रहते हैं। अधर्मी धर्म के प्रणेता के रूप में पूजे जाते रहते हैं। भोले लोगों के मन से खेलकर कुछ लोग इतनी संपत्ति भी इकट्ठा कर लेते हैं कि उसे कभी गिना ही नहीं जा सकता। अनेकों वर्षों बाद पता चलता है कि वह वास्तव में अधर्मी था।
संदेह करना ज्ञानी का कर्तव्य है। सच ढूंढना एक ज्ञानी का कर्तव्य है। जनमानस को सत्य से परिचित कराना भी एक ज्ञानी का कर्तव्य है। इन सबके साथ सत्य ज्ञात होते ही अपनी पूर्व धारणा को त्याग देना ही एक सच्चे ज्ञानी का लक्षण है।
मुनि शंख और मुनि लिखित ने सुधन्वा पर संदेह किया। पर जब सत्य ज्ञात हो गया कि यह कोई षड्यंत्र नहीं है अपितु लीला पुरुषोत्तम की ही लीला है तब वह भी दया के निधान भगवान द्वारिकाधीश और उनके परम भक्त सुधन्वा का गुणगान करने लगे। दूसरी तरफ सुधन्वा अपने आराध्य के ध्यान में इस तरह खो गये कि उन्हें कुछ भी ध्यान नहीं रहा।
आखिर दोनों गुरुओं ने ही अपने शिष्य और आज के रण के प्रमुख योद्धा सुधन्वा को जगाने का निश्चय कर एक बहुत कठोर निर्णय लिया जो किसी सामान्य के वश की बात नहीं है।
दोनों उच्च स्वर में बोलते हुए गर्म तेल की कढाई की तरफ चलते गये।
" हे दीनों पर दया करने बाले, अपने भक्तों का मान रखने बाले, विश्व के निर्माता, पालनकर्ता और संहारक। अपने ज्ञान के भ्रम में हम चूर थे। आज प्रत्यक्ष भक्ति का प्रभाव देख लिया। भले ही हम सुधन्वा के समान भक्त तो नहीं हैं पर यह भी सत्य है कि हम प्रत्येक जीव में आपकी ही सत्ता को देखते हैं। यदि हमारा उद्देश्य भक्त का अपमान करना नही था, तो हे दीनानाथ। यह गर्म तेल भी हमारे लिये चंदन की तरह शीतल बन जाये। यदि हम पाखंडी हों, तो इस गर्म तेल में जलकर अभी मृत्यु को प्राप्त हों। "
दोनों गुरु मुनि शंख और लिखित भी उसी गर्म तेल की कढाई में कूद गये। उनके लिये भी गर्म तेल शीतल हो गया। उनके सर की चोट भी सही हो गयी। दोनों गुरुओं ने सुधन्वा को चैतन्य किया। उसे बाहर निकाल कर ले आये।
" चंपकपुरी के वीरों। आज रण में आप अपराजेय रहोंगे। भक्त सुधन्वा के नैत्रत्व में अर्जुन की सेना से मुकाबला कीजिये। भगवान श्री कृष्ण अवश्य आयेगें। यदि गुरु का स्थान भगवान के समान होता है तो गुरु के रूप में मैं आशीर्वाद देता हूं कि बिना भगवान श्री कृष्ण की सहायता के अर्जुन आपको युद्ध में जीत नहीं पायेगा। यदि यह सत्य है कि भक्त का स्थान भगवान से भी बढकर है तो भक्तराज सुधन्वा के प्रण को भगवान द्वारिकाधीश अवश्य पूर्ण करेंगें। यदि यह बात भी सत्य है कि एकपत्नी व्रत का पालन करने बाला नर अपराजेय शक्तियों का स्वामी होता है तो भी आज रण में आपकी जीत ही होगी। भगवान द्वारिकाधीश का नाम लेकर रण भूमि की तरफ निकलिये तथा आज सायं भगवान श्री कृष्ण के साथ ही चंपकपुरी में वापस आइये। "
चंपकपुरी के वीर पहले से ही अपनी जीत के लिये निश्चित थे। फिर सुधन्वा की भक्ति का प्रभाव देख और दोनों गुरुओं के आशीर्वाद के बाद अब उन्हें कोई संदेह नहीं रहा कि आज के रण की परिणति अपने आराध्य भगवान श्री कृष्ण के दर्शन ही है। भगवान श्री कृष्ण और भक्तराज सुधन्वा की जयनाद के साथ चंपकपुरी के वीर रणभूमि के लिये निकल लिये। रण के रूप में अपने आराध्य की आराधना की लालसा मन में रखे चंपकपुरी का कोई भी साधारण सैनिक इस समय युद्ध में अर्जुन को हराने में सक्षम था। फिर भी बड़े योद्धा का मान तो रखा ही जाता है। निश्चित हो गया कि अर्जुन से मुकाबला सुधन्वा ही करेंगें। मुकाबला केवल आस्त्रज्ञान का ही नहीं होगा। अपितु यह मुकाबला भगवान श्री कृष्ण के दो परमभक्तों की भक्ति का भी होगा। निश्चित ही अस्त्र ज्ञान में ऊंच नीच हो सकती है। पर दोनों भक्ति में तो किसी से कम नहीं पड़ेंगे।
धर्म संकट की स्थिति प्रायः संसारी साधकों के लिये बतायी जाती है। पर धर्म संकट की स्थिति अनेकों बार भगवान के लिये भी आ जाती है। क्या हो यदि भगवान के ही दो परमभक्त भगवान की शक्ति के ही बल पर दो विपरीत प्रण ले लें। फिर भगवान भी धर्म संकट की स्थिति से गुजरेंगे ही । खुद का प्रण छोड़कर अपने भक्त के प्रण की रक्षा करने बाले भक्तवत्सल भगवान किस तरह अपने दो भक्तों के प्रणों की रक्षा कर सकते हैं। पर सच तो यही है कि भगवान असंभव को भी संभव बना सकते हैं। अपने दो भक्तों के प्रणों की रक्षा कर सकते हैं।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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