मैं
स्त्री हूँ
कितने
किरदारों 
को निभाती मैं
पह   चान   नहीं
चलती  रहती   हूँ
देखती  सबके  मुँह
कभी खुद को न देखा
चाहती सबकी खुशियां
न देखी कभी अपनी खुशी
निशा   की  सहचरी  बनकर
निपटाती हूँ सभी काम घर के
अनायास  मिलता  एक खिताब
करती ही  क्या हो दिनभर बैठकर

स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह'