अथाह शक्ति सम्पन्न, निर्गुण अनादि परब्रहम
खेता नाव समस्त जगत की, धर्म हीन मानव शरीर की !
क्षमा सदैव अपराध कीजिए,मम बुद्धिहीन प्राणी के
माया मोह में रची हुइ,अपटु अल्पज्ञ वाणी के !
अंनत राग द्वेष ह्रदय में, स्वार्थ सिद्धि के मद में
उछलता जलनिधी लहरों सा, भटकता चंचल मन्मथ में !
करूणामय ह्रदय से,निज अपराधों को सहता हूं
कर्मशील बन विधि भाग्य को,अपने हाथों रचता हूं!
विस्मृत कर देता हूं,अंतसमन पीड़ा को
विश्वास यही आराध्य मेरा,देख रहा हर क्रीड़ा को !
नित लगा रहूं प्रयासों में, मंज़िल पाने की होड़ नहीं
अपनों के मन को पा जाऊं, अधिकारों की दौड़ नहीं !
फलविहीन तरु से ,फल पाने की क्यों आस करूं?
प्रतिफल मिलता सत्कर्मो़ का,मात्र यही विश्वास करुं !
रोपा है उस अंनत शक्ति ने,बीज वही फलेगा
माटी की कच्ची काया हूं,तप कर कंचन वर्ण मिलेगा !
प्रभुता का अधिकार ना मांगू, सत्यनिष्ठ रहे ये काया
चिरलीन निंद्रा जब आए, रूग्णता का घेरे ना साया !
स्वरचित, मौलिक, सर्वाधिकार सुरक्षित,,
कीर्ति चौरसिया
जबलपुर मध्यप्रदेश

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